योग से रेलवे क्लर्क इंडिया से पहुंचा था इंग्लैंड, यह जान ब्रिटिश अधिकारी गिर गया पैरों में

कभी रेलवे क्लर्क रहे श्यामा चरण लाहिड़ी अपनी विद्या से इंडिया में बैठे-बैठे इंग्लैंड तक पहुंच जाते थे। वे योग से अपने माइंड को कंट्रोल करते थे और आत्मा को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर कर लेते थे। तो आप भी जानिए एक रेलवे क्लर्क से लाहिड़ी कैसे बन गए योगगुरु-

यह किस्सा श्यामा जी के रेलवे में कार्यकाल के दौरान का है। श्यामा जी का ब्रिटश अधिकारी बहुत परेशान था। अपने तप से उन्होंने उसकी परेशानी भांप ली।  कुछ देर बाद उसके पास पहुंच कर बोले, “आप परेशान मत होइए। इंग्लैंड में आपकी पत्नी ठीक है। मैं अभी-अभी वहीं से देख कर आ रहा हूं।”

इस पर अधिकारी ने इन्हें पागल समझ कर नौकरी से बर्खास्त कर दिया, लेकिन ये अपनी नौकरी पर रोज आकर आफिस के बाहर खड़े रहते थे। कुछ दिनों बाद इंग्लैंड से अधिकारी की पत्नी आई तो इन्हें देख कर चौंक गई। उसने अपने पति से कहा, “यह आदमी तो मेरे घर आया था। मेरे बेडरूम में भी आया था।”  यह सुनते ही ब्रिटिश अधिकारी इनके पैरो में गिरकर माफी मांगने लगा।

 रेलवे क्लर्क थे लाहिड़ी कैसे बने योगगुरु

काशी के चौसट्टी घाट पर योगीराज का समाधी स्थल ‘सत्य लोक’ है। प्रेजेंट में श्यामा चरण लाहिड़ी  के नाती सत्याचरण के बेटे शिवेंद्रु लाहिड़ी यहां के पीठाधिस्वर हैं। “क्रिया योग की वजह से उन्हें योगीराज कहा जाता है। उनकी खास बात थी कि वे गृहस्थ जीवन के साथ घर मे बैठकर क्रिया योग करते थे।”  श्यामा चरण लाहिड़ी दानापुर में रेलवे क्लर्क की नौकरी करते थे। उनके साथ उनकी पत्नी, दो बेटे और एक नाती रहता था। नौकरी के दौरान इनकी पोस्टिंग देहरादून में हुई, जहां रेल की पटरियां बिछाने का कार्य चल रहा था।  एक दिन रेल पटरी बिछवाते वक्त लाहिरी को एक रहस्मयी आवाज आई ‘श्यामा इधर आओ’। दूसरे दिन फिर वही आवाज आई और लाहिड़ी आवाज के पीछे-पीछे चल पड़े।  चलते-चलते काफी दूर पर्वतों के बीच वे आवाज के स्रोत के पास पहुंच गए।

 रहस्यमयी बाबा ने बदली जिंदगी

वहां इनकी मुलाकात महावतार नाम के रहस्यमयी बाबा से हुई।  बाबा ने इन्हें बताया, “पिछले जन्म में तुम्हारी साधना अधूरी रह गई थी। उसे अब पूरा करने का समय आ गया है।”  महावतार बाबा ने लाहिड़ी को उनके पूर्वजन्म के आसान, चटाई और अन्य समान दिखाए।  इसके बाद फिर इनको दीक्षा देकर अपने साथ द्रोणगिरि पर्वत के खोह में लेकर चले गए। कई वर्षों बाद साधना पूरी हुई और गुरु की आज्ञा से श्यामा चरण लाहिड़ी वापस काशी आ गए। अंतिम समय तक नौकरी के बाद शिव भक्ति के साथ-साथ साधुओं को क्रियायोग की दीक्षा देते रहे।

1 रुपए में खरीदी आश्रम की जमीन

काशी की चौसट्टी गली में बने लाहिड़ी के आश्रम की कहानी बड़ी रोचक है। कोलकाता के एक जमींदार ने यहीं एक शिव मंदिर बनवाया था। पूजा नियमित न हो पाने से जमींदार बहुत दुखी हुआ और दुखी मन से बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन करने पहुंचा। वहां माथा टेकने पर उसकी आंखों में एक तस्वीर आने लगी। जब उसने यह घटना वहां के महंत को बताई, तो महंत ने उन्हें काशी के दो शिवभक्तों के नाम सुझाए – पहला तैलंग स्वामी और दूसरा श्यामा चरण जी।  जमींदार पहले तैलंग स्वामी के यहां गया। वहां संतुष्टि नहीं मिलने पर वह श्यामा जी के घर गया। श्यामा जी को देखते ही उनके पैरों में गिरकर रोने लगा और मिन्नत कर उन्हें अपने मंदिर का पुजारी बनवा दिया।

लाहिड़ी की भक्ति से जमींदार बहुत खुश हुआ। उसने उनसे अपनी पूरी संपत्ति दान में लेने की मिन्नत की। योगीराज श्यामा इस प्रकार किसी दूसरे की संपत्ति लेने को तैयार नहीं हुए। उनका मन रखने के लिए जमींदार ने महज 1 रुपए में अपनी पूरी जमीन उन्हें बेच दी। वहीं श्यामा लाहिड़ी ने आश्रम का निर्माण करवाया, जिसे आज लोग ‘सत्य लोक’ के नाम से जानते हैं।

इंडिया में बैठे-बैठे पहुंचे थे इंग्लैंड, अफसर की बीवी का लिया हालचाल

यह किस्सा श्यामा जी के रेलवे में कार्यकाल के दौरान का है। श्यामा जी का ब्रिटिश अधिकारी बहुत परेशान था। अपने तप से उन्होंने उसकी परेशानी भाप ली और कुछ देर बाद उसके पास पहुंच कर बोले, “आप परेशान मत होइए। इंग्लैंड में आपकी पत्नी ठीक है। मैं अभी-अभी वहीं से देख कर आ रहा हूं।”  इस पर अधिकारी ने इन्हें पागल समझ कर नौकरी से बर्खास्त कर दिया, लेकिन ये अपनी नौकरी पर रोज आकर आफिस के बाहर खड़े रहते थे। कुछ दिनों बाद इंग्लैंड से अधिकारी की पत्नी आई तो इन्हें देख कर चौंक गई। उसने अपने पति से कहा, “यह आदमी तो मेरे घर आया था। मेरे बेडरूम में भी आया था।” यह सुनते ही ब्रिटिश अधिकारी इनके पैरो में गिरकर माफी मांगने लगा।

बिना इजाजत नहीं खींच पाए फोटो

एक बार कुछ फोटोग्राफर इनके ध्यान क्रिया की फोटो खींचने की कोशिश कर रहे थे। बहुत प्रयासों के बावजूद फोटो नहीं आ रही थी। कुछ देर बाद कैमरों में विशालकाय शरीर की फोटो आने लगी। इस पर पर फोटोग्राफरों ने श्यामा जी से फोटो खींचने की परमिशन मांगी। तब जाकर उनकी एक फोटो बनी, जिसके लोग आज भी दर्शन करते हैं।

कुछ ऐसी थी महिमा

एक बार तैलंग स्वामी अपने शिष्यों के साथ काशी में थे। रास्ते में श्यामा जी को देख उन्हें अभिवादन किया। जिस पर उनके शिष्यों ने कहा, “आप इतने बड़े संत फिर आप ने उस साधारण पुजारी को क्यों प्रथम प्रणाम किया?” तब उन्होंने अपने शिष्यों को समझाते हुए कहा, “जिस चीज को पाने के लिए मैंने लंगोट बांधकर अपनी पूरी जिंदगी यहां-वहां घूमते हुए लगा दी, उस चीज को इस इंसान ने घर बैठे प्राप्त किया है। तब बताओ कि हम दोनों में बड़ा कौन?”

मुर्दे में डाल दी जान

एक बार श्यामा जी के एक शिष्य का मित्र मरणासन्न हो गया। शिष्य मित्र की जान बचाने की गुहार लेकर इनके पास आया। तब श्यामा जी ध्यानमग्न थे।  वो बार-बार अपने मित्र की दुहाई देकर आंखे खोलने के लिए बोलता रहा, लेकिन उनकी आंखे नहीं खुलीं। कुछ देर बाद जब लाहिरी जी जागे, तब तक शिष्य के मित्र का प्राणपखेरु उड़ चुके थे। इस पर शिष्य ने ताना देते हुए कहा, “कुछ देर पहले आंखे खोल देते, तो मेरा मित्र बच जाता।”  इस श्यामा जी ने कहा, “अपने मित्र के मुंह में जलते दीपक का एक चमच्च तेल डाल दो। उठकर बैठ जाएगा। ऐसा ही हुआ।