‘आत्मा’ को पहचानने से ही कटेगा ‘मायाजाल’

निखिल दुनिया ब्यूरो। आचार्य शंकर ने अद्वैत वेदांत दर्शन द्वारा लोगों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करने का महत्वपूर्ण काम किया। शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत दर्शन में ब्रह्म और जीवन को एक एक ही मानकर उसकी जबर्दस्त भौतिकवादी व्याख्या की थी। अपने उपदेशों में उन्होंने कहा था कि छोटे-बड़े किसी भी नाम से ईश्वर को भजने अथवा मानने वाले सब एक परम पिता को ही भजते हैं, क्योंकि सबमें वही बसा है। जैसे सम्पूर्ण नदियों का एक ही गम्य स्थान है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों का भी एक ही गम्य स्थान-यानी एक ही ईश्वर है।

समुद्र से गर्मी के कारण बादल बनते हैं और आकाश में उमड़-घुमड़ कर बरस जाते हैं। पृथ्वी में नदी नाले फिर से समुद्र में ही मिल जाते हैं। अब ऐसे में समुद्र में और नदी-नालों में द्वैत या भिन्नता कहां रही, बल्कि उनमें पूर्ण अद्वैत है। कुम्हार मिट्टी गूंथ कर एक ढेर बनाता है और आवश्यकतानुसार आकार-प्रकार के भेद वाले भिन्न-भिन्न बर्तन बनाता है। तब उन बर्तनों के नाम भी अलग-अलग हो जाते हैं। क्या उन बर्तनों और मिट्टी में द्वैतता है? कदापि नहीं! उनकी मौलिकता तो वही मिट्टी का ढेर है। आकार मात्र से हम उन्हें भिन्न-भिन्न देख रहे हैं। जब वे बर्तन पुराने होकर टूट-फूट जायेंगे तो पुनः उसी मिट्टी में मिल जायेंगे। यह बात अद्वैत की पुष्टि करती है।

आदि गुरु अपने अद्वैत दर्शन द्वारा दो तथ्य प्रतिपादित करने में अत्यंत सफल रहे। पहला था समानता का सिद्धांत, यानी कि यदि सभी में
ब्रह्म  है, सभी में एक तत्व है, तो फिर कैसी ऊंची-नीची जातियां और कौन छोटा-बड़ा धर्म। दूसरे, उन्होंने समाज में ज्ञान की प्रतिष्ठा स्थापित की। ज्ञान को सर्वोपरि माना। यह ज्ञान कोई डिग्री का ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान ग्रंथों का ज्ञान भी नहीं है। यह ज्ञान ‘समझदारी का पर्याय’ है, बोध का पर्याय है, जिसे उन्होंने विवेक कहा है।

अंग्रेजी में इसे ‘विज्डम’ और संस्कृत में ‘प्रज्ञा’ कह सकते हैं। सम्पूर्ण वेद-वेदान्त, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत सभी एक परब्रह्म की उपासना का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आचार्य शंकर ने संसार को माया कहा है तथा मिथ्या बताया है। लेकिन उनका यह मानना बिल्कुल नहीं था कि संसार को माया मान कर भाग जाओ या कर्म ही न करो। उनका भाव तो यह था कि व्यवहारिक जीवन में संसार के कर्तव्यानुसार अच्छे कर्मों को करते हुए जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करो। संस्कार और कर्मफल को क्षीण करने या भोगने के लिए संसार की सत्ता निश्चित है लेकिन परिणामशील है। संसार केवल कार्यक्षेत्र है न कि मुक्ति क्षेत्र।

संसार तथा संसार के सम्पूर्ण कर्मानुष्ठान ठीक तथा दृढ़तापूर्वक करने से मुक्त होने के लिए एक साधन मात्र है। माया के जाल को काटने के
लिए आत्मा को पहचानना आवश्यक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-अपने ‘आत्मा’ द्वारा ही अपना उद्धार करें, अपने को पतन की ओर न ले जायें। मनुष्य स्वयं ही अपना बन्धु है तथा स्वयं ही अपना शत्रु है। ज्ञान,भक्ति, उपासना और कर्म द्वारा अपने को उबारो और समझो।

कबीर ने भी कितना सुन्दर कहा है ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक महं आगि। तेरा साईं तुझ में बसै, जागि सके तो जागि।। कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढै बन माहिं। ऐसे घटि-घटि राम हैं, दुनियां देखै नाहिं।। इसका भावार्थ यही है कि अपने को मथो और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो, जिससे कि मायाजाल से छुटकारा मिल सके। व्यक्ति को सदा यह समझना चाहिए कि आत्मा एक राजा की तरह है। जो शरीर, इंद्रियों, मन, बुवि और भी जो प्रकृति से बना है, इन सबसे भिन्न है। आत्मा इन सबका साक्षी स्वरूप है। जिस प्रकार एक प्रज्वलित दीपक को चमकने के लिए दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती है। ठीक उसी प्रकार आत्मा जो स्वयं ज्ञान स्वरूप है, उसे किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है। यह मोह से भरा हुआ संसार एक स्वप्न की तरह है। वह तब तक ही सत्य प्रतीत होता है

जब तक व्यक्ति अज्ञान रूपी निद्रा में सो रहा होता है। लेकिन जाग जाने पर इसकी कोई सत्ता नहीं रहती। आत्मा अज्ञान के कारण ही सीमित मालूम जान पड़ती है। परंतु जब अज्ञान मिट जाता है, तब आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य दिखाई देने लगते हैं। आचार्य शंकर का कहना था कि मानव तीर्थों में इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन इसका उसे कोई फायदा नहीं मिल पाता। जब तक मन का मैल साफ नहीं हो जाता तब तक सारे तीर्थ निष्फल होते हैं। आत्मा सच्चिदानन्द, नित्य, निर्मल स्वरूप है। सर्वव्यापक ब्रह्म का जो लक्षण है वही सत्, चित्, आनन्द लक्षण जीव का भी है।