अहं ब्रह्मास्मि

निखिल दुनिया ब्यूरो।

सात वर्ष की उम्र में ही शंकर वेद, वेदांत का पूर्ण अध्ययन कर घर वापस लौट आए थे। उनका मुख मण्डल ज्ञान से जगमगाने लगा था। निरंतर अद्वैत ब्रह्म का चिन्तन करते-करते बुद्धि निर्मल हो चुकी थी। बालक शंकर की विद्वता और चमत्कार पूर्ण कार्यों को सुनकर केरल नरेश ने उनकी सेवा में सुन्दर हाथी और बहुमूल्य भेंट सामग्री भेजकर महल में आने का निमंत्रण दिया। जिस पर शंकर ने मंत्री को अपना संदेश कहा कि-हमें बुलाने के स्थान पर यदि वे अपने राज्य में सभी वर्णों की प्रजा को करमुक्त कर दें और जीविका का साधन उपलब्ध करा दें तो वह अधिक अच्छा होगा।

जिस राज्य में प्रजा अपने धर्म का पालन करते हुए अपना कर्म करती है वह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों की तुलना में अधिक सम्पन्न होता है। इन बातों का प्रभाव राजा पर इस प्रकार पड़ा कि वह दूसरे दिन ही साधारण आदमी की तरह शंकर के दर्शन को पहुंच गया। शंकर कहते हैं-राजन! इस संसार में जो बुद्धिमान लोग हैं, उन्हें अपनी आवश्यकताएं सीमित करके समाज सेवा के ब्राह्मण व्रत का भी पालन करना चाहिए।

विद्या, ज्ञान, सदाचार, न्याय, नैतिकता तथा धर्मनिष्ठा से सामाजिक जीवन ओत-प्रोत रहे, कुविचार से लोग बचे रहें, यह उत्तरदायित्व राजा का ही नहीं, उन व्यक्तियों का भी है जो प्रबुद्ध हैं। बदमाशों को दंड देना, सत्पुरुषों की रक्षा करना यह राजा का धर्म है। लेकिन ब्राह्मण का कर्तव्य इन सबसे सर्वोपरि है। वह समाज की आत्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं, सत्परंपराओं को जीवित और जाग्रत रखता है।

भूले, भटके, अज्ञानी, दलित, पथ-भ्रष्ट लोगों को राह पर लाने और सामान्य लोगों का आध्यात्मिक मार्गदर्शन ब्राह्मणों का कार्य है। ऐसा जहां होता है, वहां के लोग खुशहाल और संपन्न होते हैं। आज प्रबुद्ध व्यक्ति भी अपने स्वार्थों और भोग-विलास में समय नष्ट कर रहे हैं। आगे शंकर कहते हैं कि ब्रह्म का निरंतर स्मरण करने से चित्त की शुद्धि होने से विवेक जागृत होता है। मैं देह नहीं हूं, देह से अलग हूं। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि ये सभी आत्मा से पृथक हैं।

इस प्रकार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ही ब्रह्म हूं। व्यक्ति बार-बार इस चिन्तन में लगा रहता है कि मैं अमुक नाम का देहधारी हूं, मेरे गांव का नाम यह है, मैं सुखी हूं दुखी हूं आदि से स्वयं को समझने का प्रयास करता है। इसीलिए प्राणी मोह में जकड़ जाता है। ठीक इसके उल्ट यदि वह स्वयं को नित्य, शुद्ध, मुक्त परमतत्व स्वरूप, परब्रह्म को जानने का निरंतर अभ्यास करे तो उसकी अज्ञानता दूर होकर वह आत्म साक्षात्कार कर लेता है। जो आत्मा में रमण करता है वही राम है, वही कृष्ण हैं। योगी जो आत्मतत्व का जिज्ञासु है उसका पूरा जीवन ही धन्य है।