ईश्वर नाम भव रोगों की औषधि

भारतीय जीवन पद्धति में आयुर्वेद केवल चिकित्सा की एक पद्धति नहीं, वरन् परिवार के एक आत्मीय सदस्य की तरह है। यह केवल रोगों की चिकित्सा तक ही सीमित नहीं है अपितु यह जीवन मूल्यों, स्वास्थ्य एवं जीवन जीने का सम्पूर्ण ज्ञान भी प्रदान करता है। आयुर्वेद दो शब्दों आयुष् और वेद से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है ‘जीवन विज्ञान’। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में मूल तीन तत्व-वात, पित्त और कफ हैं। इनमें संतुलन रहने पर कोई भी रोग आप तक नहीं पहुंच सकता। इनका संतुलन बिगड़ने पर ही कोई बीमारी शरीर पर हावी हो जाती है। आयुर्वेद केवल रोगों का उपचार ही नहीं करता बल्कि एक-एक अंग को कुशल माली की तरह काटता-छांटता और सजाता संवारता भी चलता है। जिससे वह आन्तरिक रूप से पुष्ट हो सके।

आयुर्वेद को भारतीय मनीषियों द्वारा भारतीय जीवन में एक पवित्र व उच्चतम स्थान दिया जाना स्वाभाविक ही था। क्योंकि वे जानते थे कि ईश्वर प्रदत्त इस देह के माध्यम से ही जीवन में प्रत्येक दृष्टि से सफलता और तपस्या की पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। जब मानव शरीर निरोगी होगा तो तभी वह साधना, सुख, भोग, विलास और जीवन के उत्तरार्द्ध में ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है। हमारे ऋषि-मुनि जानते थे, कि दुर्बल और रोगी देह तोसमाधि के सुख का भी अनुभव नहीं कर सकती है। रोगों से बोझिल और जर्जर देह न तो इस जगत के कदम-कदम पर सुखों का भोग कर सकता है और न ही परालौकिक जगत की उन विलक्षण अनुभूतियों का साक्षात्कार कर सकती है। कई हजारों वर्ष पूर्व महर्षियों ने अपनी समाधि में जिस प्रकार से मानव देह का एक-एक अंग देख और परख लिया, उसकी सूक्ष्म विवेचना कर दी थी उसके आगे तो आज का आध्ुनिक चिकित्सा विज्ञान अपने उन्नत और परिष्कृत यंत्रों के साथ भी बौना मालूम पड़ता है।

पंच तत्वों से गठित और बहत्तर हजार नाड़ियों के तार में गूथे हुए इस शरीर की सरंचना तो आज जटिल संयंत्रों से भी पूरी तरह नहीं देखी जा सकती है। आश्चर्य की बात यह है कि जो क्रियाएं आज सूक्ष्म और परिस्कृत यंत्रों से भी सपफलता से नहीं की जा सकती उसे हमारे ऋषि मुनियों ने अपनी प्रज्ञा द्वारा समझ कर विवेचित किया और व्यापक रूप से भी शल्य चिकित्सा के माध्यम से सफलता हासिल की। वहीं आज के समय में हम देखते हैं कि दुनिया के अस्पताल मरीजों से भरे पड़े हैं। हर किसी शहर में अस्पतालों की तादाद बढ़ती जा रही है और गली-गली में दवा की दुकानों में भी सुबह से सायं तक ग्राहकों की कतारें लगी रहती हैं। यह बात उस क्षेत्र की तरक्की या खुशहाली का प्रतीक नहीं बल्कि इस बात का गवाह है कि रोगियों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। इनमें अधिकांश रोगी शारीरिक कम और मानसिक रोग से ज्यादा पीड़ित जान पड़ते हैं।

आज से कुछ सदियों पूर्व तक मानव मानसिक तल पर इतना रोगी नहीं था जितना शारीरिक तल पर। भले ही आज विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली हो लेकिन अपने साथ भयंकर मानसिक तनाव और दूषित मानसिकता को भी पैदा कर दिया है। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, हिंसा आदि ऐसे मानसिक रोग हैं जिनसे आज मनुष्य बुरी तरह से प्रभावित है। इनके कारण वह शरीर के तल पर भी अस्वस्थ हो रहा है। इस भागम-भाग भरी जिन्दगी के कारण हम ईश्वर को ही भूला बैठे हैं। यानी मूल रोग तो आत्मा का परमात्मा से विछोह है। यही रोग है, यही दुख है, जो अनन्त रोगों को जन्म देता है। ईश्वर की सत्ता सर्वत्रा विद्यमान है, क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है। इसका मतलब है कि ईश्वर मानव के हृदय से दूर हो गया है। क्योंकि हमारे चिन्तन और आचरण में ईश्वर की सत्ता को भूला दिया गया है। योगियों का दावा है कि अगर उस परमात्मा की याद दिल में बनी रहे तो रोग और शोक तो पास पफटक ही नहीं सकते हैं। रोगी मन के पास ही रोगी तन होता है और ऐसे रोगी के लिए प्रभु का चिन्तन ही औषधि है।

वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ईश्वर का चिन्तन और ध्यान करने से मानव के हृदय में शान्ति आती है। जिससे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद की पद्धति भी तो यही बताती है। आज जरूरत इस बात की है कि मनुष्य का ध्यान इस ओर लगाया जाए, जिससे वह शारीरिक और मानसिक रोगों को दूर धकेलकर शत वर्ष की आयु जी सके। इसी कामना के साथ –
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्।।