लाखीराम जोशी ने बंजर खेतों को बना दिया हरा-भरा

  • अब बेरनी गांव के बंजर खेतों में उगलेगा सोना
  • ग्रामीणों ने बंजर खेतों में तैयार की बागवानी
  • खेतों में लगाए केला, आम, कटहल, अनार के पौधे 

नई टिहरी। कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों…। और सचमुच से उछाले गए ग्रामीणों के हर पत्थर ने विशाल आसमान को छेद कर अपना लक्ष्य पा लिया। यह पत्थर था दृढ़ आत्म विश्वास का, कड़े परिश्रम का और सतत लगन का। जी हां बेरनी गांव के ग्रामीणों ने अपनी मेहनत के दम पर बंजर जमीन को दोबारा से हरा-भरा कर अनूठी पहल की है। गांव के प्रत्येक परिवार ने अपने बंजर खेतों में वैज्ञानिक ढंग से केला, आम, लीची, कटहल, अनार के पेडों की बागवानी तैयार कर ली है। मगर इस योजना के पीछे पूर्व मंत्री लाखीराम जोशी का एक सपना था, जो ग्रामीणों की मदद से धरातल पर साकार होता नजर आ रहा है।

कहते हैं अगर मन में कुछ करने का जज्बा हो तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। बंजर जमीन को दोबारा से आबाद करने की यह कहानी खाड़ी क्षेत्र के बेरनी गांव की है। अपने गांव के बंजर पड़े खेत पूर्व मंत्री लाखीराम जोशी को टीस देते थे। ऐसे में उन्होंने गांव के बंजर पड़े खेतों को हरा-भरा करने की सोची। इस विचार को उन्होंने आगे प्रधान ज्ञान सिंह रावत के समक्ष रखा तो उन्हें भी बात जम गयी। फिर क्या था, बात आगे बढ़ती चली गयी और गांव के सभी लोगों ने एक सुर से बागवानी के लिए हामी भर दी।

तो फिर क्या था ग्रामीणों ने बंजर खेतों में उगी झाड़ियों को साफ कर दिया। इसके बाद उद्यान विभाग के विशेषज्ञों की मदद से ग्रामीणों ने वैज्ञानिक तरीके से खेती करने की तैयारी शुरू कर दी। ग्रामीणों की डिमांड को देखते हुए उद्यान विभाग ने गांव में विभिन्न फलदार पौधों की ढाई हजार प्रजाति भेज दी। फिर क्या था देखते ही देखते ग्रामीणों ने अपने बंजर खेतों में कटहल, अनार, तेजपत्ता, मोटी ईलायची, नारंगी, संतरा के पौधे लगाकर बागवानी तैयार करनी शुरू कर दी। बागवानी को लेकर उत्साह इस कदर हो गया कि कई ग्रामीणों के लिए पौधे ही कम पड़ गए। ऐसे में पूर्व मंत्री लाखीराम जोशी ने एक हजार से अधिक पौधों को खुद मंगाकर ग्रामीणों को पौध वितरित की। अब बंजर खेतों में हरे-भरे पौधों को देखकर ग्रामीणों की आंखों में खुशी की चमक है।

केले की प्रजाति है खास
बेरनी गांव में उत्तक संवर्धन (टिशू कल्चर) केले की प्रजाति लगायी गयी है। इस प्रजाति की कई खासियत हैं। इसमें कीट और रोग नहीं आते हैं। इसके साथ ही इसमें स्थानीय प्रजाति की अपेक्षा डबल फल आते हैं। जिस कारण यह किसानों की आर्थिकी बढ़ाने में मददगार साबित होगी।