आयुर्वेद का आधार

डाॅ दिनेश जोशी।
यद्यपि आधुनिक सभी पद्धतियां आयुर्वेद से निकली हैं परन्तु अन्य पैथियों में एलोपेथी के आधरभूत सिद्धान्त केमेस्ट्री, फिजिक्स तथा बायोलोजी है। आयुर्वेद का आधारभूत सिद्धांत ‘दर्शन’ हैं। दार्शनिक काल में षडदर्शन लिखे गये जिनके आविष्कार करने वाले गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि, जैमिनी, व्यास ये छः ऋषि हुए हैं। इनमें से गौतम की बुद्धि का चमत्कार न्याय शास्त्र है। जिसमें गौतम कहते हैं कि कुलाल (कुमार) के समान परमात्मा असंख्य जीवों की रचना करता है। वह एक है और आत्मायें असंख्य है।

आत्मायें कर्मानुसार जन्म-मरण को प्राप्त होती है और केवल प्रमाण को ही सिद्ध किया है। कणाद की बुद्धि का प्रतिपफल वैशेषिक दर्शन है। जिसमें कणाद ने समय को प्रधान माना है। अर्थात् जगत सम्पूर्ण काल के अधीन है। महात्मा कपिल की खोज का प्रतिफल ‘सांख्य शास्त्र’ है। कपिल का सिद्धांत है-प्रकृति और पुरूष का विवके सुन्दर प्रकार से किया है। सृष्टि की उत्पति उसके सभी प्रकृति पुरूष के संयोग से सिद्ध किये हैं।

महात्मा पतंजलि का विज्ञान-‘योगशास्त्र’ है। जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया है कि जीव ईश्वर से पृथक् है इसलिए योग द्वारा जीव का ईश्वर से नियोग करके मनुष्य निर्वाण मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। इनके योग शास्त्रों की गणना उनके चमत्कारों का वर्णन कहां तक किया जा सकता है। योग के नाना प्रकार के विधन साध्नों से योगी क्या कुछ करने में समर्थ नहीं हो सकता? पाश्चात्य विद्वानों में अब कुछ कनिष्ट योग का जन्म हुआ है।

जिसको वे लोग ‘मेस्मरेजम्’ और ‘हैप्नोटिज्म’ कहते हैं। महात्मा जैमिनी की प्रसिद्ध खोज का फल ‘पूर्वमीमांसा’ है जिसका सिद्धान्त है अर्थात् मनुष्य को सब प्रकार के दुःख का त्याग और सुख की उपलब्धि केवल उसके शुभाशुभ कर्मों पर निर्भर है। व्यास की विद्वता का प्रतिफल उत्तर मीमांसा है जो वेदान्त कहलाता है। इसका सिद्धांत है कि परमेश्वर सर्वव्यापी है और आत्मा ईश्वर से भिन्न नहीं है।

आयुर्वेद का आविष्कार भी उसी उन्नति के काल में हुआ। इसमें बड़ी-बड़ी खोजों की तथा अथक परिश्रम था। पूर्व में बताया गया है कि इसके प्रथम आविष्कर्ता ब्रह्माजी कहे जाते हैं। इनका प्रथम ग्रन्थ भी ‘ब्रह्मसूत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है। अब लोग नाम तो जानते हैं किन्तु वह ग्रन्थ सम्पूर्ण नहीं मिलता। ब्रह्माजी के पश्चात् अश्विनी कुमार, धन्वन्तरि, अग्निवेश, चरक इत्यादि अनेक ऐसे आचार्य होते चले आये हैं जिनकी अलौकिक बुद्धि शक्ति ने आयुर्वेद की नई-नई खोज तथा आविष्कारों से उसे और अधिक पुष्ट कर दिया है। इस प्रकार आयुर्वेद के आधरभूत सिद्धान्त ‘दर्शन’ ही हैं और उनमें भी आयुर्वेद सांख्यशास्त्र के अधिक निकट हैं।

भारतवर्ष का विज्ञान और शिल्प वर्तमान काल में केवल कथावशेष रह गया है। विज्ञान की कथा जानने के लिए रामायण, महाभारत आदि विद्यमान हैं। प्राचीन आर्यों की सुतीक्ष्ण बुद्धि और उद्योग कार्य परायणता के प्रभाव से समय पर धनुर्वेद, खनिज विद्या, भूगर्भ विद्या, पदार्थ विद्या, पशु चिकित्सा, कृषि चिकित्सा, स्थावर विद्या, जल स्थंवन विद्या आदि अनेक प्रकार की विद्याओं का आविष्कार और प्रचार हुआ था। आशा की जाती है कि भारत पुनः विश्व गुरुत्व को प्राप्त करेगा। इति