जीवन में मेहमान बन कर रहें

जवीन अस्थाई है। क्षणिक है हाथ में बंधी हुई घड़ी न सिर्फ समय बताती है बल्कि कट-कट की ध्वनि द्वारा संकेत करती है कि जवीन निरंतर कट रहा है, घट रहा है। आप जहां है वहां के मालिक नहीं बल्कि मेहमान हैं। मेहमान को जो आदर सम्मान अथवा साधन उपलब्ध होते हैं। रहने के लिये सुन्दर व्यवस्था एवं खाने पीने की जो तैयारी होती है उनमें वह अस्थायी पन को स्पष्ट देखता है और अपने ममत्व एवं लगाव को सीमित रखता है। क्योंकि वह जानता है कि यह मेरा अपना स्थान नहीं है।

मेरा यहां से जाना निश्चित है। ठीक वैसी ही विचार धारा जीवन जीते समय अपने घर परिवार के प्रति होनी चाहिये। जैसे एक कन्या अपने पीहर (पिता) के घर में परिवार के अंग के रूप में रहती है और माता पिता भाई बहन के सुख दुःख में हाथ बंटाती है। परन्तु मन निंरतर चिंतन एवं दृष्टि अपने घर पति पर रखती है। जहां उसकी आसक्ति है, उसे ही अपना घर परिवार मानती है, जो वस्तु स्थिति है हमारे वर्तमान जीवन में इसी प्रकार का दृष्टिकोण होना चाहिये कि मुझे भी यहां से देर सबेर परलोक को जाना ही है। अतः पुण्य प्रवृति और सुकृत के कामों में अधिकाधिक समय व्यतीत करें।

प्रसंगवस एक घटना का वर्णन आता है कि एक संन्यासी शहर से गुजर रहे थे। रात में देर हो गयी। वे राजभवन के निकट पहुंचे और राज भवन के सिपाहियों से बोले कि मुझे रात भर इस सराय में ठहरने की अनुमति दी जाये। सिपाहियों ने कहा यह सराय नहीं राजा का महल है। संन्यासी ने कहा मेरी दृष्टि में तो सराय ही है। इस पर चर्चा हो ही रही थी कि ऊपर से राजा ने देखा और नीचे आकर सन्यासी से कहा यह सराय नहीं मेरा राजमहल है। तब सन्यासी ने मुस्करा कर कहा – यही बात बीस साल पहले तुम्हारे दादा ने कही, फिर दस साल पहले तुम्हारे पिता ने और तुम भी इसी अहंकार में हो परन्तु जब इसके पूर्व स्वयं को इस महल का मालिक घोषित करने वाले का अब कोई अता पता नहीं रहा तो इस बात की क्या गारंटी है कि तुम मुझे अगली बार इसके मालिक के रूप में यहां मिल पाओगे ?

सन्यासी की बात सुनते ही राजा का विवेक जागा और कह उठा कि महाराज हकीकत में मैं इसका मालिक नहीं मेहमान हूं। यह राज महल नहीं सराय ही है। जहां कुछ समय के लिये मुसाफिर आते जाते रहते हैं। आज यहां पुण्य बल से ऐशो आराम का जीवन बिताते हैं। उसका अस्तित्व कितना है ? जैसे बर्फ के किसी टुकड़े को रेगिस्तान की गर्मी में रख दिया जाय तो पिघलने में उसे कितनी देर लगेगी ? बड़ा होगा तो घंटा आधा घंटा और छोटा होगा तो पांच दस मिनट कम परन्तु पिघलना एवं समाप्त होना तो निश्चित है तथा समाप्त होने के कुछ देर बाद वहां नामोनिशान भी नहीं रहेगा। यह बात संसार में आसक्त हर व्यक्ति पर लागू होती है। महापुरूष कहते हैं –
उछल लो कूद लो, जब तक जोर है नलियों में।
मगर याद रखो, एक दिन राख उछलेगी गलियों में।