स्तंभकार

गंगा: हमारी सभ्यता की जननी

प्रो. गोविन्द सिंह। सात-आठ साल पहले की बात है. एक कालेज में पत्रकारिता पढ़ाने हरिद्वार गया हुआ था. हालांकि इससे पहले भी दो-एक बार हरिद्वार जाना हुआ था लेकिन इस बार कुछ फुर्सत में था….

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हैप्पी न्यू इयर लेकिन कौन सा?

प्रो. गोविन्द सिंह। वर्ष 2017 भी तमाम उतार-चढ़ावों के बाद आखिर अलविदा हो ही गया और 2018 भी आ गया. युवावस्था में जो उत्साह नए वर्ष को लेकर मन में रहता था, अब नहीं होता….


धर्मगुरु का पतन कैसे हुआ?

प्रो. गोविन्द सिंह। भारत में धर्मगुरु एक समानांतर सत्ता रहे हैं। आज भले ही हम धर्म और राजनीति को एक साथ न मिलाने की बात करते हैं, लेकिन एक जमाना था, जब भारत में धर्मसत्ता…


शिक्षा को विसंगतियों से बचाइए

प्रो. गोविन्द सिंह जाने-माने स्तंभकार यदि आज हमारे देश में धर्म और अध्यात्म के प्रति सकारात्मक भाव नहीं दिख रहा, धर्म के विकृत स्वरुप का बोलबाला दिखाई पड़ता है, तो उसकी सबसे बड़ी गुनहगार हमारी…


खामोश! गाय हमारी माता है…

गोविन्द सिंह इन दिनों गाय को लेकर जबरदस्त शोर है. एक तरफ गाय की महिमा में अतिशयोक्ति और अतिरंजना से भरी बातें कही जा रही हैं तो ऐसे भी सुर सुनायी पड़ रहे हैं, कि…


प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं सहयोग करें

प्रो. गोविन्द सिंह (निखिल दुनिया ब्यूरो)। अपने देश में प्रकृति और ईश्वर दोनों को पर्याय ही माना गया है. चाहे लोक हो या शास्त्र, दोनों ने प्रकृति के महत्व को बराबर स्वीकार किया है. हमारा…


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क्यों मृत्यु नहीं है जीवन का अंत

स्वामी शिवानंद मृत्यु का अर्थ है भौतिक शरीर से आत्मा का जुदा होना है। मृत्यु नये और बेहतर जीवन का एक प्रारंभिक बिन्दु बन जाता है। यह जीवन के उच्च रूप का द्वार खोलता है।…