खामोश! गाय हमारी माता है…

गोविन्द सिंह

इन दिनों गाय को लेकर जबरदस्त शोर है. एक तरफ गाय की महिमा में अतिशयोक्ति और अतिरंजना से भरी बातें कही जा रही हैं तो ऐसे भी सुर सुनायी पड़ रहे हैं, कि जैसे गाय को हम जानते ही न हों, जैसे वह किसी भी अन्य भक्षण किये जाने वाले जानवर की तरह हो. अन्य धर्मावलम्बियों की बात जाने भी दें तो हिन्दुओं में ही ऐसे लोग हैं, जिनके मन में गाय को लेकर किसी प्रकार की आस्था नजर नहीं आती. वे उसे सिर्फ प्रोटीन का स्रोत बता रहे हैं. उन्हें दूध, दही, मक्खन, घी, छाछ या गोमूत्र नजर नहीं आता, उन्हें गाय के शरीर में सिर्फ प्रोटीन दिखाई देता है. गाय के पक्ष में जो लोग खड़े हैं, उनमें से कुछ लोग वैज्ञानिक तरीके से गाय से जुड़ी अर्थव्यवस्था को तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं, जो काफी हद तक विश्वसनीय लगते हैं, लेकिन फिर भी दूसरा पक्ष उन पर भरोसा नहीं करता. गांधी से लेकर विनोबा तक बड़ी संख्या में हमारे स्वाधीनता सेनानी गोरक्षा के पक्ष में खड़े रहे. लेकिन वे उसे लागू करवा पाने में विफल रहे. नतीजा यह रहा कि आज तक गाय गोमाता और प्रोटीन के बीच झूलती रही.

धर्मप्राण हिन्दू मानते हैं कि: “गाय के शरीर में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास होता है. उसकी पूजा करने से सभी देवता खुश हो जाते हैं.गोमाता श्री कृष्ण की परम आराध्या है, वह भवसागर से पार लगाने वाली है.वह मानव जाति के लिए कामधेनु है. वह हमारे मन की हर इच्छा को पूर्ण कर सकती है.”

हमें बचपन से यह घुट्टी में पिलाया जाता रहा है कि “गोमाता, धरती माता और जन्म देने वाली माता एक सामान हैं. उनकी रक्षा करना हमारा परम कर्त्तव्य है.जो उसे मारता या सताता हैया किसी भी प्रकार का कष्ट देता है, उसकी 21 पीढियाँ नर्क में जाती हैं. शास्त्रों में गोसेवा को सबसे बड़ा पुण्य कहा गया है. सदैव अपने भोजन से पहले गौग्रास देना चाहिए. इससे हमेशा श्रीवृद्धि होती है.गाय साक्षात् जगदम्बा है.”

“गाय के दूध, घी, दही, गोबर, और गौमूत्र; इन पाँचों को ‘पञ्चगव्य’ कहा जाता है, जिसके द्वारा मनुष्यों के पाप दूर होते हैं.गौ माता के दर्शन, गौ की पूजाऔर परिक्रमा करने सेसारे तीर्थो का फल मिल जाता है, गाय सर्वतीर्थमयी है, गौ कीसेवा से घर बैठे ही 33 कोटि देवी-देवताओं की सेवा हो जाती है.गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है।गंगा, गऊ, गोपी, गीता और गायत्री सनातन संस्कृति के आधार हैं।इन पांचों की पूजा होती है”।

जो लोग गो-रक्षा के विरुद्ध हैं, उनसे मुझे कुछ नहीं कहना है. पर मेरा सवाल तो उन लोगों से है, जो गाय को पूजते हैं या उसे अपनी मां से बढ़कर समझते हैं, उन्होंने आज गाय की क्या हालत बना रखी है! गांवों में भलेही लोग गाय को थोड़ा-बहुत मानते हैं, लेकिन जिस तरह से शहरों में गाय सडकों के किनारे कूड़े के ढेर में मुंह मारते या प्लास्टिक खाते देखी जाती है, कितनी ही गायें पोलीथीन खाने से मर जाती हैं, इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है? कितने हिन्दू हैं जो दूध न देने वाली गाय को मुसलमान के हाथ बेच देते हैं! कितने हिन्दू हैं जो दालान में चारा देने की बजाय अपनी गाय को कचरे के ढेर की तरफ हांक देते हैं! कितने हिन्दू हैं जो ऊपर कहे गए सुभाषितों का पालन करते हैं! क्या यह सच नहीं है कि गाय से हम हिन्दुओं ने ही मुख नहीं मोड़ लिया है! यह एक हकीकत है. आज यदि हमारा हिंदुत्व जाग उठा और गाय के प्रति हम अचानक आस्था दर्शाने लग जाएँ तो वह निहायत कृत्रिम होगा.

सोचिए कि ऐसा क्यों हुआ? दरअसल हमें यह सोचना होगा कि परिस्थितियों के साथ हमारी आस्थाएं भी बदलती हैं. क्या दस साल पहले कोई यह सोच सकता था कि कोई राजनेता डंके की चोट पर कहे कि गोमांस भक्षण में कोई एतराज नही होना चाहिए, और वह चुनाव जीत जाए! लेकी आज यह हो रहा है. आखिर ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि कुछ वर्ष पहले तक हमारी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि थी और कृषि का आधार थी गाय. हमारे ग्राम्य जीवन के केंद्र में थी गाय. हम उसका दूध पीकर बड़े होते थे, उसके मक्खन-घी से ताकतवर बनते थे, उसके गोबर से अपने घर को लीपते थे, उसके पुत्र हमारे हल जोतने के काम आते थे, गोदान-पूजन करके हम धन्य होते थे, उसके गोमूत्र से खुद के तन-मन को शुद्ध करते थे और अपनी बीमारियों को भी दूर भगाते थे. ऐसी बहु-उपयोगी गाय को हम पूजनीय नहीं तो और क्या कहेंगे? वास्तव में गाय महज एक जानवर नहीं, वह एक भरपूर जीवनशैली थी.

लेकिन आज स्थितियां बदल गयी हैं. कृषि पर से हमारा ध्यान धीरे-धीरे हटता जा रहा है. ग्राम्य-व्यवस्था टूट रही है और शहरीकरण पूरी तरह से अपना आकार नहीं ले पाया है. गांवों से ही लोग पलायन करके शहरों की तरफ आ रहे हैं. खेती-बाड़ी छोड़ कर अन्य पेशे अपना रहे हैं. गाय से उनका नाता छूट रहा है. कृषि की जगह उद्योग-व्यापार ले रहे हैं. व्यापार में आस्था नहीं, मुनाफ़ा परम धर्म होता है. जिस व्यक्ति ने गो-केन्द्रित ग्राम्य-व्यवस्था देखी ही न हो, उसका मर्म ही न जाना हो, वह कैसे गाय को अपनी माता बता सकता है? सिर्फ धर्म ग्रंथों का हवाला देकर गाय को वह देवी नहीं मान सकता. आस्था के नाम पर आज भलेही हम गोहत्या पर रोक लगा लें, लेकिन जिस पैमाने पर ग्लोबलाइजेशन बढ़ रहा है, अंतर्राष्ट्रीय आवा-जाही बढ़ रही है, उसके चलते हम कब तक इसे रोक लेंगे! गुडगाँव की बहुमंजिला इमारत की चौबीसवीं मंजिल पर रहने वाले और बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करने वाले व्यक्ति का क्या सरोकार रह गया है गाय से? वह दवा के लिए भलेही पतंजलि का गोमूत्र भी पी लेगा, लेकिन इससे उसका गाय से जुडाव नहीं हो जाएगा. भलेही वह कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार से ही क्यों न हो! इसलिए केवल गाय-गाय चिल्लाने से कुछ नहीं होगा, गाय के प्रति हमें अपने व्यवहार में भी तब्दीली लानी होगी. समय के पहिये को फिर से पीछे नहीं मोड़ा जा सकता किन्तु यदि सचमुच हम गाय को उसका खोया सम्मान वापस दिलाना चाहते हैं तो हमें अपनी भोगवादी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना होगा.यकीनन गाय पूजनीय है किन्तु इसे हमें व्यवहार में भी लाना होगा.