गौ रक्षा आवश्यक है

(सन्त विनोबा भावे)। मैं मानता हूँ कि भारत की सभ्यता की यह माँग है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी ही चाहिए। अगर हम हिंदुस्तान में गौरक्षा नहीं कर सके, तो आजादी के कोई मानी ही नहीं होते। यह बात मैंने प्लानिंग कमीशन के सामने भी स्पष्ट शब्दों में कही थी। परन्तु आज हम जिस हालत में हैं और हरेक राज्य की सरकार जब इस विषय पर सोच रही है, उस हालत में उपवास आरम्भ करना मैंने अच्छा नहीं माना।

हिंदुस्तान में आज कई तरह के असंतोष हैं यह मैं जानता हूँ। परन्तु सबका इलाज एक ही है। जनमत तैयार करना चाहिए और सबसे काम लेना चाहिये। आज देश के सामने कई समस्याएँ हैं। एक साथ सभी समस्या पर नहीं सोचा जा सकता। इसलिए एक-एक समस्या पर ही हम सोच सकेंगे। परन्तु मैंने कहा है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी चाहिये। अगर गौरक्षा नहीं होती, तो कहना होगा कि हमने अपनी आजादी खोयी और उसकी सुगन्ध गंवायी।

मैंने कुरान और बाइबिल का गहराई और अत्यंत प्रेम के साथ अध्ययन किया है। और जिस तरह मैंने वेदों का चिन्तन किया है, उसी तरह कुरान और बाइबिल का भी किया है। इसलिए मैं मुसलमान और ईसाइयों की ओर से उनका प्रतिनिधि बनकर कहता हूँ कि उन दोनों धर्मों में ऐसी कोई बात नहीं है कि गाय का बलिदान हो। उन धर्मों में बलिदान की बात तो है। वैसे हिंदु-धर्मों में भी है। परन्तु गाय का ही बलिदान होना चाहिए, ऐसी कोई बात उन धर्मों में नहीं है। और इस्लाम की तो यह आज्ञा है कि अपने पड़ोसी की भावनाओं का खयाल रखा जाय। इसलिए मैं कहता हूँ कि गौरक्षा होनी चाहिए। परन्तु आजकल कुछ लोगों को हिंदु कहलाने में भी झिझक मालूम होती है। यह बात गलत है।

मैं तो कहता हूँ कि हरेक हिंदू अच्छा हिंदू बने, हरेक मुसलमान अच्छा मुसलमान बने और हरेक ईसाई अच्छा ईसाई बने। और यहाँ पर सब धर्मों का एक शुभ संगीत चले। एक दूसरे की उपासना से एक दूसरे को पुष्टि मिले। और सब मिलकर भगवान का गुणगान करें। भगवान के अनन्त नाम और अनन्त गुण हैं। जब एक मामूली शहर में पहुँचने के लिए कई रास्ते होते हैं, तो भगवान के पास पहुँचने के भी असंख्य रास्ते हो सकते हैं।

इसलिए हर कोई अपने-अपने मार्ग से भगवान के पास पहुँचने की कोशिश करें। जिससे हिंदु न सिर्फ अच्छे हिंदु बनेंगे बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे। मुसलमान न सिर्फ अच्छे मुसलमान बनेंगे बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे, ईसाई न सिर्फ अच्छे ईसाई बनेंगे, बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे। इसलिये सब अपने-अपने धर्मों की एकाग्रता और निष्ठा से उपासना करें, यही मैं चाहता हूँ। इससे हमारे देश में एक मधुर स्नेहमय जीवन बनेगा। इसलिए हिंदुओं को हिंदु कहलाने में लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिये बल्कि उनको निष्ठा से हिंदु-धर्म की उपासना करनी चाहिये।

गाय और बैल दोनों मिलकर गौ कहा जाता है। दोनों में फर्क नहीं है। वेदों में गाय के लिए ‘अघ्न्या’ और बैल को ‘अघ्न्य’ कहा गया है। इस शब्द का मतलब है कि जिसको मारना नहीं। गौ का आदर करते हैं। परन्तु उसकी सेवा का काम नहीं करते हैं फिर भी हमारे मन में उसके लिए आदर है। और जिस तरह हम अपने घर के बूढ़े लोगों की रक्षा करते हैं उसी तरह गाय-बैलों को भी हमने अपने परिवार में दाखिल कर लिया है। उन दोनों का हम पूरा उपयोग लेंगे, दूध लेंगे, उनके गोबर का उपयोग करेंगे,  परन्तु उन्हें सहज मृत्यु मरने देंगे। यह बात यहाँ के समाजवाद ने मानी है। लेकिन उसके साथ हमें वैज्ञानिक बुद्धि भी रखनी चाहिये। सिर्फ गाय की पूजा करने से काम नहीं होगा। गोसदन खोलना चाहिए, कमजोर गायों कि रक्षा के लिए व्यापारियों और श्रीमान लोगों को मदद करनी चाहिए।

मैंने जो भूदान का काम उठाया है, उसमें गौरक्षा भी अन्तहित है। परन्तु मेरी यह वृत्ति है कि ‘एक ही साधे सब सधे।’ यह काम ऐसा है कि इससे सारे समाज का परिवर्तन होगा, तो उसमें गाय की भी रक्षा हो जायगी। दूसरे देश के लोग हमें पूछ सकते हैं कि आप सिर्फ गायों की ही रक्षा क्यों करते हैं दूसरे जानवर की क्यों नहीं करते इस पर मैं कहना चाहता हूँ कि हमने परमेश्वर की जिम्मेवारी नहीं उठायी है। हमने अपनी मर्यादा मान ली है। हम गाय-बैलों का उपयोग करते हैं, इसलिए उनकी रक्षा की जिम्मेवारी हमने मान ली है। आजकल जो ट्रैक्टर की बात चलती है, उसे मैं पसन्द नहीं करता। उससे गौरक्षा नहीं हो सकती। पड़ती जमीन तोड़ने के लिए ट्रैक्टर का उपयोग हो सकता है परन्तु सामान्य खेती के काम में उसका उपयोग करना यानि गौ-हत्या ही करना होगा।