धर्मगुरु का पतन कैसे हुआ?

प्रो. गोविन्द सिंह। भारत में धर्मगुरु एक समानांतर सत्ता रहे हैं। आज भले ही हम धर्म और राजनीति को एक साथ न मिलाने की बात करते हैं, लेकिन एक जमाना था, जब भारत में धर्मसत्ता थी। धर्मगुरु के आगे बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी झुक जाया करते थे। ऐसा यों ही नहीं हुआ था। धर्मगुरुओं ने यह दर्जा अपने त्याग, बलिदान, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से अर्जित किया था। वे समाज में अपनी स्थिति का निहित स्वार्थ के लिए बेजा फायदा नहीं उठाते थे। उनका जीवन अपने समाज,राष्ट्र और मानवता के लिए समर्पित हुआ करता था। जब हमारे राष्ट्र का समाज बिखर रहा था, हमें आदि गुरु शंकराचार्य ने एकता का पाठ पढ़ाया था।

जब हमारा देश दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द ने दिशा दिखाई। इन्हीं धर्मगुरुओं की वजह से हमें विश्वभर में प्रतिष्ठा मिली थी, लेकिन हाल के वर्षों में उन्होंने हमें बहुत लज्जित किया है। आदि शंकर की बनाई हुई व्यवस्था को हमारे जमाने के शंकराचार्यों ने अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

लगातार एक के बाद एक ऐसे किस्से सामने आये हैं, जिनके बारे में सुनते ही खेद होता है। हम यह नहीं कहते कि सभी धर्मगुरु एक से हैं या जो आरोप उन पर लगे हैं, वे सही ही हैं। वह सब साबित करना कानून का काम है, लेकिन जिस तरह से धर्मगुरुओं की बाढ़ आ गयी है और जिस तरह की पंचतारा कंपनियां उन्होंने खोल ली हैं, ये बहुत अच्छा संकेत नहीं
है। वे लगातार धन-संचय, व्यापार और कई तरह के आरोपों से घिरते जा रहे हैं।

समाज में धर्म का प्रचार-प्रसार हो, यह अच्छी बात है लेकिन धर्म के नाम पर कुछ लोगों का व्यापार देखते ही देखते अरबों का हो जाए, और उनके चर्चे समाज में आम-ओ-खास की जुबां पर आ जाएं, इससे बुरी बात और क्या हो सकती है? इससे तो धर्म की हानि ही होगी।

यह सोचने की बात है कि समाज में अचानक यह धर्म की बाढ़ कैसे आ गयी? यही वह बिन्दु है, जहां इस बीमारी का मूल कारण छिपा है। आजादी के बाद हमारे समाज-जीवन से वास्तविक धर्म धीरे-धीरे गायब होता गया है। जो जीवन शैली हमने अपना ली है, उसमें धन की, भौतिक समृद्धि की तो पर्याप्त जगह है, लेकिन जिन कारणों से हमारा समाज जाना जाता था, वे सब लुप्त होते गए। त्याग और सादगी हमारी मुख्य पहचान थी, उन्हें हमने भुला दिया। जीवन में से जैसे अध्यात्म गायब हो गया।

जब हमारे राष्ट्र का समाज बिखर रहा था, हमें आदि गुरु शंकराचार्य ने एकता का पाठ पढ़ाया था। जब हमारा देश दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द ने दिशा दिखाई। धर्म और अध्यात्म हमारे कदम-कदम पर था। उनके बिना हम अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते थे। लेकिन अंग्रेजी शिक्षा ने वह सब हमसे छीन लिया। भारतीय जीवन मूल्य जैसा भुला दिया गया। किसी भी राष्ट्र के जीवन में संस्कार भरती है शिक्षा। जब शिक्षा ही पराए अर्थात् पश्चिम का गुणगान करने लगे तो भावी संतानें दोगली होनी ही थीं।

हम आधुनिक और विज्ञान सम्मत शिक्षा के विरोधी नहीं हैं, लेकिन हर बात के लिए पश्चिम की ओर मुंह ताकना कहां तक जायज है? अंग्रेजों ने समझा हमारे जाने के बाद भी हमारी शिक्षा बरकरार रहेगी। हमारे जीवन मूल्य सुरक्षित रहेंगे। हम चले जाएंगे लेकिन हमारे मानस-पुत्र राज करेंगे। बहुत हद तक यह हुआ भी है। लेकिन आप किसी भी सभ्यता को इतनी जल्दी समाप्त नहीं कर सकते। आप हमसे हमारा वर्तमान छीन सकते हैं, हमारे वर्तमान को अपने हिसाब से ढाल
सकते हैं, लेकिन हजारों वर्षों से जीवित सभ्यता को नहीं मिटा सकते।

हमारे इतिहास और परम्पराओं को हमसे नहीं छीन सकते। बिना हमसे छीने हमारे भूगोल को नहीं बदल सकते। इस प्रकार पिछले 15-20 वर्षों से, खासकर विश्व फलक पर भारत के अभ्युदय के बाद दुनियाभर में भारत को जानने-समझने की ललक बढ़ी है। फिर हमने जिस तरह की समाज-व्यवस्था और अर्थनीति को अंगीकार किया है, जिस तरह का इंसान हम बना रहे हैं, उसने आग में घी डालने का काम किया।

अर्थात् पश्चिम आधारित हमारे विकास माॅडल ने जिस तरह की आपाधापी को जन्म दिया है, जिस तरह से शहरीकरण बढ़ रहा है, उससे मनुष्य लगातार भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस कर रहा है। वह धन के पीछे दौड़ रहा है। यह एक अंतहीन दौड़ है। ऐसे में जब आधुनिक मानव थक-हार बैठ जाता है, ‘सब कुछ’ प्राप्त कर लेने के बाद भी अतृप्त रह जाता है, तब उसे मुंह की याद आती है। अपनी जड़ों की ओर मुड़ने का मन होता है।

आपको आश्चर्य होगा कि हमारे ज्यादातर साधु-संन्यासी भी अमेरिका जाकर ही तृप्त होते हैं। बिना अमेरिका का ठप्पा लगे उन्हें बड़ाधर्मगुरु नहीं माना जाता। जो लोग धर्म-विरोधी, भारतीय विरोधी शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका पहुंचते हैं, एक समय आता है, जब वे मोह भंग के शिकार बनते हैं। उन्हें रह-रह कर अपनी परम्पराएं याद आती हैं।

अपने पूजा-विधान, कर्मकांड याद आते हैं। ऐसी अवस्था में कोई ‘संत’ चार शब्द संस्कृत के बोल देता है, उसे सर-आंखों पर बिठा लिया जाता है। यही वजह है कि अधिकांश स्वामी अमेरिका से लौटकर ही अपना आश्रम बनाते हैं। यही हालत अब अपने देशवासियों की भी हो रही है। इसीलिए वे भी धर्म की ओर लौट रहे हैं।

एकाकी परिवार में सुकून के पल खोजने वे अक्सर धर्मगुरुओं के पास जा पहुंचते हैं। यही नहीं कभी ज्योतिषियों के पास, कभी ओझे-सयानों के पास तो कभी तांत्रिकों के पास जा पहुंचते हैं। जब घर के गुरु उपलब्ध न हों तो बाहर के गुरुओं की तलाश ही होनी है। इस तरह हाल के वर्षों में गुरुओं की डिमांड बेतहाशा बढ़ी है। जब धर्मगुरुओं की मांग बढ़ी तो आपूर्ति भी बढ़नी ही थी। यह बात अलग है कि मांग के अनुरूप प्रशिक्षित गुरुओं की आपूर्ति नहीं हो सकती थी। इतनी बड़ी संख्या
में ऐसे लोग थे ही नहीं।

यही वजह है जो चालाक थे, वे भी इस पेशे में घुसने लगे। एक बार एक व्यक्ति कार्यालय में मिलने आये। उनका रूपरंग देखकर मैं हैरत में आ गया। युवावस्था में तो वह ऐसे न थे। वह तो निहायती बदमाशों की श्रेणी में आते थे। अब प्रौढ़ावस्था में अचानक उन्हें गेरूए वस्त्र पहने, गले में रुद्राक्ष की माला लटकाए देख आश्चर्य हुआ। आखिर किसी व्यक्ति
का इतना हृदय परिवर्तन कैसे हो सकता है? हमने पूछा कि काम कैसा चल रहा है, बोले बहुत अच्छा। ईश्वर की कृपा से किसी चीज की कमी नहीं। गाड़ी है, बंगला है, नौकर-चाकर हैं। साथ में राजनीतिक पहुंच है। क्या नहीं है?

इस समृद्धि का राज अंत में जाते-जाते बोल गए कि ‘राष्टज्डीय राजमार्ग के किनारे तीन शनि मंदिर डाल दिए हैं।’ तो मित्रों टीवी पर प्रवचन देते हुए सैकड़ों धर्मगुरु दिखाई पड़ते हैं। उनमें से अधिकांश ऐसे ही ‘गुरु’ हैं। उनके चोले को देखकर हमें गलतफहमी में नहीं जाना चाहिए। थोड़ा सा भजन-कीर्तन कर लेने, गीता-रामायण के श्लोक-चैपाइयां रट लेने, प्रवचन के चार-छह शब्द सीख लेने, कुछ लटके-झटके अपनाकर भक्त मंडली का मनोरंजन कर लेने भर से कोई संत नहीं बन सकता। इसलिए सावधान होकर चुनिए अपना गुरु। बेहतर तो यह होगा कि अपने अंतर के गुरु को पहचानिए।बाह्य गुरु इतनी आसानी से नहीं मिला करते।                                                                            (लेखक जाने-माने स्तंभकार हैं।)