क्यों धुंधकारी बन गया एक प्रेत?

  • श्रीमदभागवत कथा सुनकर धुंधकारी का हुआ उद्धार
  • ऐसे सुनेंगे कथा तो स्वयं आएंगे भगवान

प्राचीन समय की बात है। दक्षिण भारत में तुंगभद्रा नदी के किनारे एक नगर में आत्मदेव नाम का एक व्यक्ति रहता था। जो सभी वेदों में पारंगत था। उसकी पत्नी का नाम धुंधली था। धुंधली स्वरूप से तो सुंदर थी लेकिन स्वभाव से बहुत क्रूर और झगड़ालू थी। उनके घर में सब प्रकार का सुख था मगर वह व्यक्ति अपनी पत्नी से दुखी तो था ही साथ ही उसको संतान का सुख भी नहीं था। वह दिन-रात चिंता में रहता था कि यदि उम्र ढल गयी तो संतान सुख नहीं मिल पाएगा। वह बड़े दुखी मन से अपने प्राण त्यागने के लिए जंगल चला गया। जंगल में तालाब में वह कूदने ही वाला था। तभी एक संन्यासी ने उससे पूछा कि कहो ब्राह्मण तुम्हें ऐसी कौन सी चिंता है, जिस कारण तुम अपने प्राण त्यागना चाहते हो।

आत्मदेव ने कहा ऋषिवर मैं संतान के लिए इतना दुखी हो गया हूं कि अपना जीवन निष्फल लगता है। मैंने जिस गाय को पाल रखा है वह भी बांझ है। मैं जो भी पेड़ लगाता हूं उस पर भी फल-फूल नहीं लगते हैं। मैं अपने घर में जो फल लाता हूं वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है। इन सब बातों से मैं दुखी हो गया हूं। ऐसा कहकर वह व्यक्ति रोने लगता है। यह सुनकर वह संत उसके माथे की रेखाओं को देखता है। तब रेखाओं को देखकर वह कहता है कि हे ब्राह्मण! कर्मों की गति बड़ी प्रबल है, वासनाओं को छोड़ दो। सुनो, मैंने तुम्हारे भाग्य को देख लिया है। इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्मों तक तुम्हें संतान सुख नहीं मिल सकता है। तब ब्राह्मण कहता है कि फिर मुझे प्राण त्याग देने चाहिए या फिर आप मुझे पुत्र प्राप्ति का मार्ग बताइए।

जब वह संत देखता है कि यह किसी भी प्रकार से समझाने पर भी प्राण त्यागने पर तुला हुआ तो वह अपनी झोली में से एक फल निकालकर कहता है कि अच्छा ठीक है, इसे तुम अपनी पत्नी को खिला देना। इससे उसको एक पुत्र होगा। आत्मदेव वह फल लाकर अपनी पत्नी को दे देता है। लेकिन उसकी पत्नी मन ही मन सोचती है कि यदि मैंने यह फल खा लिया और गर्भ रह गया तो मुझसे खाया नहीं जाएगा और मैं मर भी सकती हूं। यह सोचकर वह तय करती है कि मैं फल नहीं खाउंगी। इसलिए वह आत्मदेव से कई प्रकार के बहस करती है। मगर जब आत्मदेव नहीं मानता है तो वह आत्मदेव के कहने पर फल तो रख लेती है मगर खाती नहीं है।

एक दिन उसकी बहन उसके घर पर आती है, जिसे वह पूरा किस्सा सुनाती है। बहन उससे कहती है कि, मेरे पेट में बच्चा है। उसके पैदा होने पर मैं वह संतान मैं तुम्हें दे दूंगी। तब तक तुम घर पर ही गर्भवती के समान रहो। मैं कह दूंगी कि मेरा बच्चा मर गया है। तू इस फल को गाय को खिला दे। आत्मदेव की पत्नी ऐसा ही करती है। उस फल को वह गाय को खिला देती है। समय बीतने पर उसकी बहन अपने बच्चे को धुंधली को ला कर दे देती है। पुत्र के पैदा होने की बात सुनकर आत्मदेव को बड़ा आनंद हुआ। धुंधली ने अपने बच्चे का नाम धुंधकारी रखा। इसके तीन माह बीतने के बाद एक दिन आत्मदेव गाय को चारा डालने गया। तो उसने देखा कि गाय के पास एक बच्चा है जो मनुष्य के आकार का है मगर उसके कान गाय के समान थे। उसे देखकर वह आश्चर्य में पड़ जाता है। हालांकि उसे बड़ा आनंद भी होता है। वह उस बच्चे को उठाकर घर ले आता है और उस बच्चे का नाम गोकर्ण रखता है।

अब उसके दो बच्चे हो जाते हैं। एक धुंधकारी और दूसरा गोकर्ण। गोकर्ण बड़ा होकर विद्वान निकलता है जबकि धुंधकारी दुष्ट, नशेड़ी, क्रोधी, चोर, व्यभिचारी और अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला निकलता है। वह माता-पिता की सारी संपति तक नष्ट कर देता है। एक दिन वह पिता को मार-मार कर घर से बाहर निकाल देता है। पिता रोने लगता है और कहता है मेरी पत्नी का बांझ रहना ही ठीक था। तभी वहां गोकर्ण आ जाता है। वह पिता को वैराग्य का उपदेश देता है और कहता है कि आप सब कुछ छोड़कर प्रभु की शरण में जंगल चले जाएं और भगवद् भजन में लग जाएं। गो से उत्पन्न गोकर्ण की बात मानकर आत्मदेव जंगल की ओर चले गए। बाद में धुंधकारी अपनी मां धुंधली को भी सताने लगता है। जिस पर धुंधली परेशान होकर कुएं में कूदकर आत्म हत्या कर लेती है। तब धुंधकारी उसी नगर की वैश्याओं के साथ रहने लगता है।

धुंधकारी इन वैश्याओं के लिए ही धन जुटाने लगता है। वह उनके लिए डाका डालता है और चोरी करने लगता है। बाद में वे वैश्याएं सोचने लगती हैं कि यदि यह पकड़ा गया तो राजा इसके साथ हमें भी दंड देगा। यह सोचकर वह वैश्याएं सोते हुए धुंधकारी को रस्सियों से उसके गले को दबाने लगती हैं। जब वह गला दबाने से भी नहीं मरता है तो सभी उसको दहकते अंगारों में डाल देती है, जिससे वह तड़प-तड़प कर मर जाता है। बाद में गड्ढा खोदकर उसे वहां गाढ़ दिया जाता है। मरने के बाद धुंधकारी भयंकर दुख देने और अपने कुकर्मों के कारण एक प्रेत बन जाता है। प्रेत बनने के बाद वह भूख और प्यास से बैचेन हो जाता है। रह-रह कर वह चिल्लाता भी रहता है। क्योंकि उसे अंगारों से भी जलाया गया था। इसलिए उसका एहसास उसे अभी भी सताता रहता है। उसे लगता है कि अभी भी मेरा शरीर अंगार से जल रहा है।

एक दिन उसका भाई गोकर्ण उसके गांव में कथा करने के लिए आता है। गोकर्ण सबसे नजर बचाकर अपने पुश्तैनी मकान में सोने चला जाता है। अपने ही घर में अपने ही भाई को सोया देखकर धुंधकारी खुश हो जाता है और आवाज लगाता है। गोकर्ण यह आवाज सुनकर पूछता है कि तुुम कौन हो? धुंधकारी कहता है कि मैं तुम्हारा भाई हूं। मेरे कुकर्मों की गिनती नहीं की जा सकती है, इसी कारण मैं प्रेम योनि में पड़कर भयंकर दुर्दशा भोग रहा हूं। तुम मुझे इस योनि से छुटकारा दिलाओ। गोकर्ण कहता है कि मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि मैंने तुम्हारे लिए विधि पूर्वक गया में श्राद्ध किया, फिर भी तुम प्रेत योनि से कैसे मुक्त नहीं हुए? अब कुछ और उपाय करता हूं। जब कई उपाय करने के
बाद भी कुछ नहीं होता है तो अंत में वह सूर्य देव से पूछता है।

तब सूर्य देव कहते हैं कि केवल श्रीमद् भागवत कथा सुनने से ही मुक्ति हो सकती है। तब गोकर्ण व्यास गद्दी पर बैठकर कथा कहने लगा। देश-गांव से बहुत लोग कथा सुनने आने लगे। तब वहां प्रेत भी आ पहंुचा। वह इधर-उधर स्थान ढूंढने लगा। इतने पर उसकी नजर सात गांठ वाले बांस पर पड़ी। वह हवा के रूप में उस पर जाकर बैठ गया। शाम को जब कथा को विश्राम दिया गया तो एक बड़ी विचित्र बात हुई कि सभी के सामने उस बांस की एक गांठ तड़-तड़ कर टूट गयी। इसी प्रकार सात दिनों में सातों गांठ फट गयी। बारह स्कंध सुनने से पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो गया। उसने अपने भाई को प्रणाम किया। तभी वैकुंठवासी पार्षदों के साथ एक विमान उतरा। देखते ही देखते धुंधकारी उस विमान पर चढ़ गया। उन पार्षदों को देखकर उनसे गोकर्ण ने कहा, भगवान के प्रिय पार्षदों इस समय पर यहां कई शुद्ध और साफ मन वाले लोग कथा सुनने वाले थे, तो एक साथ कई सारे विमान क्यों नहीं लाए? यहां सभी ने समान रूप से कथा सुनी है। फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों? भगवान के पार्षदों ने कहा फल भेद का कारण इनमें सुनने का भेद है। यहां उपस्थित सभी ने समान रूप से ही कथा सुनी है। लेकिन इसके जैसा मनन नहीं किया है।

यह प्रेत सात दिन तक सुने गए विषयों का स्थिर चित्त से मनन करता रहा। यह कहकर वे पार्षद वैकुंठ को चले गए। सावन के महीने में गोकर्ण ने उसी प्रकार से सप्ताह तक कथा कही। फिर क्या था वहां विमान के साथ भगवान प्रकट हो गए। उस गांव के कुत्ते और चांडाल तक दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़ गए। भगवान उन सभी को गोलोक धाम ले गए। दोस्तों इस कथा का सार है कि शराब पीने वाला, वैश्य प्रेत योनि प्राप्त कर अनंत काल तक भटकता रहता है। अब ना ही गोकर्ण की तरह कथा सुनाने वाले हैं और ना ही सुनने वाले। धुंधकारी को उसके पापों कीसजा तो मिली ही साथ ही उसने प्रेत योनि में रहकर भी सजा भुगती। बाद में जब उसे पछतावा हुआ तो भागवद् कथा सुनकर मन निर्मल हो गया। मन निर्मल होने से उसके सारे संताप जाते रहे।