सा विद्या या विमुक्तये

विद्या का लक्ष्य है समस्त बंधनों से मुक्ति। उपनिषद् के ऋषि कहते हैं-सा विद्या या विमुक्तये। इन ऋषियों ने संसार का ज्ञान देने वाली विद्या को भी अविद्या कहा है। संसार से संबंधित ज्ञान भी बांधता है। इसके मूल में विषय-सुख की इच्छा होती है, इसलिए यह अविद्या है। लेकिन इसकी उपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए। स्वामी रामतीर्थ ने इसी संदर्भ में भारतीयों को पश्चिम से सीखने की बात पर बल दिया है।

भौतिक रूप से यदि  पश्चिम उन्नति कर, विश्व-मानवता को यदि कुछ दे रहा है, तो हमें उससे सीखना होगा। लेकिन बिना यह भूले कि सिर्फ इससे मानवता को सुख और शांति प्राप्त न हो सवेफगी। साधना और साध्य का अंतर बिना समझे जीवन उलझ सकता है। जब भी साधन को साध्य समझ लिया जाता है, ऐसी भूल होती है। पुराणों के चरित्र इस बात के साक्षी हैं कि जब भी खुली आंखों से जीवन को देखने का प्रयास किया गया, तो स्पष्ट रूप दिखाई दिया है कि सुख के साधनों के एकत्रित कर लेने के बाद भी सुख का जीवन में अभाव रहा है। आज भी इस सत्य का अनुभव किया जा सकता है। अपने आस-पास यदि इस बारे में जानने की कोशिश की जाए, तो साफ-साफ दिखाई देता है कि सुख के साधनों को इकट्ठा कर लेना मात्रा पर्याप्त नहीं है। उनके होने पर भी वुछ ऐसा है, जो हमें सुख से दूर रखता है। इस सत्य की जो जानकारी दे, वही विद्या है। आज कैरियरर आरिएन्टेड शिक्षा के दौर में हमें इस बात को समझना होगा।

उपनिषदों में एक कथा आती है। किसी ऋषिकुल के प्राचार्य का पुत्र जब विद्याध्ययन करने के बाद अपने घर आया, तो  उसके पिता को लगा कि कुछ महत्वपूर्ण छूट गया है। उसका अहंकार टूटा नहीं था। पिता ने पुत्र से पूछा, ‘क्या वह जाना, जिस के जानने के बाद वुफछ भी जानना शेष नहीं रहता है?’ पुत्र के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। वह वापस चला गया। उसने अपने गुरु से निवेदन किया कि वो उसे वह ज्ञान दें, जिसके बाद और वुफछ जानना शेष नहीं रह जाता। गुरु  मुस्कुराए। उन्होंने वह ज्ञान उड़ेल दिया शिष्य के हृदय में।

इस बार पिता ने दूर से आते अपने पुत्र को देखकर पहचान लिया कि उनका पुत्र उस ‘विद्या’का अर्जन कर चुका है, जिससे झूठा अहंकार टूटता है। इस ज्ञान के बाद ही मानव में पशुता का परिष्कार होता है। स्वामी रामतीर्थ के अनुसार, विद्या का उद्देश्य है-स्वयं को जानना अर्थात् आत्म साक्षात्कार। ज्ञान की विभिन्न भूमिकाओं में आत्मा अर्थात् मैं का विकास ही तो दर्शाया गया है। इसे स्वामी रामतीर्थ जी खनिज, उद्भिज, पशु, मनुष्य और देवता का नाम देते हैं।

उनका कहना है कि जब जीवन की खोज का लक्ष्य एकमात्र सत्य हो जाता है, तभी मनुष्य अमृत की उपलब्धि करता है। आज समूची मानव सभ्यता जिस दौर से गुजर रही है, उसमें इस आत्मज्ञान की सार्थकता और बढ़ गई है, क्योंकि इसमें मनुष्य स्वयं से बहुत दूर चला गया है। चारों ओर फैली अशांति का यही मूल कारण है। आज नैतिकता की चर्चा बड़े जोर-शोर से है, लेकिन इस स्वीवृफति के साथ कि नैतिक मूल्यों का पालन न करना आदमी की विवशता है। यह स्थिति बिल्कुल ऐसे योद्धा की सी है, जो युद्ध भूमि में जाने से पहले अपनी हार के पक्ष में बहाने ढूंढ़ लेता है। क्या आपने यह कहावत नहीं सुनी कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है।