शिक्षा को विसंगतियों से बचाइए

प्रो. गोविन्द सिंह
जाने-माने स्तंभकार

यदि आज हमारे देश में धर्म और अध्यात्म के प्रति सकारात्मक भाव नहीं दिख रहा, धर्म के विकृत स्वरुप का बोलबाला दिखाई पड़ता है, तो उसकी सबसे बड़ी गुनहगार हमारी शिक्षा प्रणाली है. आजादी के बाद जो शिक्षा प्रणाली हमने अपनाई, उसने हमें अपने धर्म, अपने रीति-रिवाजों, परम्पराओं, पहनावे और अपनी बोली-भाषा से प्यार करने के बजाय घृणा करना ही ज्यादा सिखाया. हमारे मानस में यह बात कूट-कूट कर भर दी गयी कि जो कुछ हमारा अपना है, वह वाहियात है. एक तरह से इस शिक्षा प्रणाली ने हमें अपनी जड़ों से घृणा करना ही सिखाया. उस पर जिस तरह से हमारे संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया, उससे धर्म को लेकर नकार का भाव पैदा हुआ. स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में यदि गलती से धर्म की तारीफ़ में एक भी शब्द आ गया तो उसको लेकर अनेक बहसें खड़ी हो जातीं. दूसरी तरफ हमारी प्राचीन परम्पराओं के विरुद्ध जान-बूझकर कल्पित कहानियां गढ़ी जाने लगीं लेकिन उनका कोई विरोध नहीं हुआ.

जोर-शोर से एक बात फैलाई गयी कि अंग्रेजों के आने से पहले इस देश में कोई शिक्षा प्रणाली थी ही नहीं. थोड़े-बहुत जो गुरुकुल थे, वे बहुत सीमित लोगों के लिए थे. स्त्रियों और निचली जातियों के लिए उनके दरवाजे बंद थे. उनमें केवल पाठ-पूजा, ज्योतिष आदि ही सिकाया जाता था, जो निहायत अवैज्ञानिक था. आदि-आदि. धीरे-धीरे यह एक अवधारणा बन गई. आज यदि आप किसी भी पढ़े-लिखे आदमी से पूछें कि अंग्रेजों से पहले भारत की शिक्षा कैसी थी, तो यही जवाब मिलेगा कि कुछ नहीं थी. साथ में यह भी कहा जाएगा कि अंग्रेजों ने हमें पहली बार वैज्ञानिक शिक्षा दी. गांधी जी से 1931 में जब लन्दन में यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसका कड़ा प्रतिकार किया. पर तब वे अपनी बात के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दे सके.

इस सवाल का पूरे प्रमाण सहित जवाब आज़ादी के बाद दिया गांधी जी के शिष्य धर्मपाल ने. उन्होंने उस समय के तमाम दस्तावेजों को खंगाल कर अंग्रेजों के आने से पहले के भारत पर कई किताबें लिखीं और यह साबित किया कि अंग्रेजों के आने से पहले न सिर्फ भारत में शिक्षा का एक मजबूत तंत्र था बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भी हर भारतीय दक्ष था. उन्होंने गांधी जी के ही शब्दों का इस्तेमाल कर शिक्षा संबंधी दस्तावेजों पर आधारित पुस्तक लिखी ‘द ब्यूटीफुल ट्री’.  आपको यह जानकार हैरानी होगी कि आन्ध्र प्रदेश के आदिलाबाद शहर में गुरूजी नाम से मशहूर रवि शर्मा ने हमारी पुरानी तकनीकों पर आधारित ज्ञान को इकठ्ठा कर बहुत ही कारगर कर्मशाला बनाई है. धर्मपाल जी के विचारों को पहले राजीव दीक्षित और अब पवन गुप्ता बहुत प्रभावी तरीके से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं.

सवाल यह है कि हमारी प्राचीन शिक्षा में ऐसा क्या था कि दस हजार साल से हमारी सभ्यता जीवित बची हुई है? धर्मपाल जी की ही खोजों को लें तो भी अट्ठारहवीं शताब्दी में ही इस देश के प्रत्येक गाँव में एक पाठशाला हुआ करती थी, जहां पढाई-लिखाई और कला-कौशल शिक्षण की प्रभावी व्यवस्था थी. जबकि तब पूरे इंग्लैंड में मुट्ठी भर भी स्कूल नहीं थे. हमारे यहाँ गुरुकुलों की भी कई श्रेणियां थीं. ऐसे ऋषिकुल और विश्वविद्यालय थे, जहां 20 हजार से अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण किया करते थे. जो शुरुआती शिक्षा ग्रहण करते थे, उसमें अक्षर ज्ञान, अंक ज्ञान के अलावा तरह-तरह के शिल्प और कारीगरी तो सिखाई ही जाती थी, साथ में आचार-व्यवहार और नीति व तर्क भी सिखाया जाता था. धर्म की आधारभूत जानकारी दी जाती थी ताकि व्यक्ति अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझ सके. कृषि, खगोल शास्त्र, आयुर्वेद, पशु विज्ञान और अभियांत्रिकी सिखाई जाती थी. अपने समाज, अपने पर्यावरण के प्रति हमारा कैसा व्यवहार होना चाहिए, इसकी मुकम्मल जानकारी दी जाती थी. इसके अलावा शालेय शिक्षा से आगे बढ़ने पर उन्हें तत्वज्ञान यानी दर्शन की शिक्षा दी जाती थी. वेद, उपनिषद और तमाम धर्मशास्त्रों का गहन ज्ञान दिया जाता था. जबकि आज हमारे बच्चों को समावेशी शिक्षा नहीं दी जाती. खानों में बंटी हुई शिक्षा दी जाती है. दुनिया-जहान की जानकारी तो हमारे बच्चों को बहुत होती है, पर अपने आस-पड़ोस के बारे में वे पूरी तरह से अनभिज्ञ होते हैं. थोड़ा आगे बढ़ते ही वे अपने दादा-दादी, नाना-नानी को हिकारत के भाव से देखने लगते हैं. आज हम अपने बच्चों को अपनी जड़ों में छिपी ताकत से वंचित रखे हुए हैं.

यानी एक तरफ हम अपने घरों में पूजा-पाठ करते हैं, तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. लेकिन उनका अर्थ नहीं जानते. क्योंकि  हमारे बच्चे उनके विरुद्ध शिक्षा ग्रहण करते हैं. जाहिर हैं ऐसे में वे दिग्भ्रमित होंगे ही. अमेरिका में उन्हें ‘कन्फ्यूज्ड देसी’ कहते हैं. हमारे देश में भी उनकी संख्या बढ़ती जा रही है. इसलिए यदि हमें अपने बच्चों को इस भ्रमजाल से बचाना है, तो समय रहते अपनी शिक्षा में अपेक्षित सुधार कर लेने चाहिए.