‘कलियुग के पापों का क्षय करने का साधन गीता’

स्वामी रामदास महाराज।

महाभारत के धर्म और अधर्म के युद्ध में कौरव और पांडवों की सेना आमने-सामने खड़ी हो गयी थी। मगर जब अर्जुन ने रण क्षेत्र के विरोधी खेमे में भीष्म पितामह, कृपाचार्य और अपने रिश्तेदारों को खड़ा देखा तो अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया। तब अर्जुन ने अपने रथ के सारथी श्रीकृष्ण से कहा कि अपने स्वजनों और बेगुनाह सैनिकों को मारकर वह जीत हासिल नहीं करना चाहता है और अंत में अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र जमीन पर रख दिए थे। तब संशय ग्रस्त अर्जुन का मोह भंग करने के लिए लगभग 40 मिनट तक श्रीकृष्ण और अर्जुन में जो संवाद हुआ, वही गीता है।

गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया था कि उसके शत्रु तो महज मानव शरीर हैं। अर्जुन तो सिर्फ मानव शरीर का अंत करेगा, आत्माओं का नहीं। हताहत होने के बाद सभी आत्माएं उस अनंत आत्मा में लीन हो जाएंगी। शरीर नाशवान है मगर आत्मा अजर-अमर है। आत्मा को न तो शस्त्र से काटा जा सकता है और ना ही जलाया जा सकता है।

गीता ज्ञान का अनुपम भंडार है। हम सब हर काम में तुरंत परिणाम चाहते हैं। लेकिन भगवान ने कहा है कि धैर्य के बिना अज्ञान, दुख, मोह, क्रोध, काम और लोभ से निवृत्ति नहीं मिलेगी। गीता केवल ग्रंथ नहीं, कलियुग के पापों का क्षय करने का अनुपम और अद्भुत माध्यम है।दुर्लभ मानव जीवन हमें केवल भोग विलास के लिए नहीं मिला है, इसका कुछ अंश भक्ति और सेवा में भी लगाना चाहिए। गीता भक्तों के प्रति भगवान द्वारा प्रेम में गाया हुआ गीत है।

अध्यात्म और धर्म की शुरुआत सत्य, दया और प्रेम के साथ ही संभव है। ये तीनों गुण होने पर ही धर्म फलता-फूलता है। जीवन उत्थान के लिए गीता का स्वाध्याय हर व्यक्ति को करना चाहिए। यह मात्र एक ग्रंथ नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों पहले कहे गए ऐसे उपदेश हैं जो मनुष्य को आज भी जीने की कला सिखाते हैं। जीवन के विभिन्न रास्तों पर उसका मार्गदर्शन करते हैं।

गीता में ज्ञानयोग, कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एकेश्वरवाद आदि की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा की गई है। आज के संदर्भ में अगर बात करें, तो गीता मनुष्य को कर्म का महत्व समझाती है। गीता में श्रेष्ठ मानव जीवन का सार बताया गया है। आज भी मनुष्य जब जीवन के कई पड़ावों पर आकर परिस्थितियों से मजबूर हो जाता है तो श्रीमद्भगवद्‌गीता ही उसे सही मार्ग दिखाती है। यह ग्रंथ उस मनुष्य को हमेशा ही सत्य का मार्ग चुनने की सलाह देता है। इसमें 18 ऐसे अध्याय हैं जिनमें आपके जीवन से जुड़े हर सवाल का जवाब व आपकी हर समस्या का हल मिल सकता है।

पहला अध्याय
गीता का पहला अध्याय अर्जुन विषाद योग है। इसमें 46 श्लोकों द्वारा अर्जुन की मनः स्थिति का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि किस तरह अर्जुन अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने से डरते हैं और किस तरह भगवान कृष्ण उन्हें समझाते हैं।

दूसरा अध्याय
गीता के दूसरे अध्याय ‘सांख्य-योग’ में कुल 72 श्लोक हैं। जिसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को कर्मयोग, ज्ञानयोग, संख्ययोग, बुद्धि योग और आत्म का ज्ञान देते हैं। यह अध्याय वास्तव में पूरी गीता का सारांश है। इसे बेहद महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।

तीसरा अध्याय
गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग है, इसमें 43 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि परिणाम की चिंता किए बिना हमें हमारा कर्म करते रहना चाहिए।

चौथा अध्याय
ज्ञान कर्म संन्यास योग गीता का चौथा अध्याय है, जिसमें 42 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को बताते हैं कि धर्मपरायण के संरक्षण और अधर्मी के विनाश के लिए गुरु का अत्यधिक महत्त्व होता है।

पांचवां अध्याय
कर्म संन्यास योग गीता का पांचवां अध्याय है, जिसमें 29 श्लोक हैं। इसमें अर्जुन, श्रीकृष्ण से पूछते है कि कर्मयोग और ज्ञान योग दोने में से उनके लिए कौन सा उत्तम है। तब श्रीकृष्ण कहते है कि दोनों का लक्ष्य एक है, परंतु कर्म योग अभिनय के लिए बेहतर है।

छठा अध्याय
आत्मसंयम योग गीता का छठा अध्याय है, जिसमें 47 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण, अर्जुन को अष्टांग योग के बारे में बताते हैं। वह बताते है कि किस प्रकार मन की दुविधा को दूर कर महारथ प्राप्त किया जा सकता हैं।

सातवां अध्याय
ज्ञानविज्ञान योग गीता का सातवां अध्याय है, जिसमें 30 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण निरपेक्ष वास्तविकता और उसके भ्रामक ऊर्जा ‘माया’ के बारे में अर्जुन को बताते हैं।

आठवां अध्याय
गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है, जिसमें 28 श्लोक हैं। गीता के इस पाठ में स्वर्ग और नरक का सिद्धांत शामिल है। इसमें मृत्यु से पहले व्यक्ति की सोच, अध्यात्मिक संसार तथा नरक और स्वर्ग जाने की राह के बारे में बताया गया है।

नवां अध्याय
राजविद्या राजगुह्य योग गीता का नवां अध्याय है, जिसमें 34 श्लोक हैं। इसे श्रीकृष्ण की आंतरिक ऊर्जा सृष्टि को व्याप्त बनाता है, उसका सृजन करता है और पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देता है, यह बताया गया है।

दसवां अध्याय
विभूति योग गीता का दसवां अध्याय है जिसमें 42 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि किस प्रकार सभी तत्त्वों और आध्यात्मिक अस्तित्व के अंत का कारण बनते हैं।

ग्यारहवां अध्याय
विश्वरूपदर्शन योग गीता का ग्यारहवां अध्याय है जिसमें 55 श्लोक है। इस अध्याय में अर्जुन के निवेदन पर श्रीकृष्ण अपना विश्वरुप धारण करते हैं।

बारहवां अध्याय
भक्ति योग गीता का बारहवां अध्याय है जिसमें 20 श्लोक हैं। इस अध्याय में कृष्ण भगवान भक्ति के मार्ग की महिमा अर्जुन को बताते हैं। इसके साथ ही वह भक्तियोग का वर्णन अर्जुन को सुनाते हैं।

तेरहवां अध्याय
क्षेत्र-क्षत्रज्ञविभाग योग गीता तेरहवां अध्याय है इसमें 35 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के ज्ञान के बारे में तथा सत्व, रज और तम गुणों द्वारा अच्छी योनि में जन्म लेने का उपाय बताते हैं।

चैदहवां अध्याय
गीता का चौदहवां अध्याय गुणत्रयविभाग योग है इसमें 27 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण सत्त्वए रज और तम गुणों का तथा मनुष्य की उत्तम, मध्यम अन्य गतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। अंत में इन गुणों को पाने का उपाय और इसका फल बताया गया है।

पंद्रहवां अध्याय
गीता का पंद्रहवां अध्याय पुरुषोत्तम योग है, इसमें 20 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि दैवी प्रकृति वाले ज्ञानी पुरुष सर्व प्रकार से मेरा भजन करते हैं तथा आसुरी प्रकृति वाला अज्ञानी पुरुष मेरा उपहास करते हैं।

सोलहवां अध्याय
दैवासुरसंपद्विभाग योग गीता का सोलहवां अध्याय है, इसमें 24 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण स्वाभाविक रीति से ही दैवी प्रकृति वाले ज्ञानी पुरुष तथा आसुरी प्रकृति वाले अज्ञानी पुरुष के लक्षण के बारे में बताते हैं।

सत्रहवां अध्याय
श्रद्धात्रयविभाग योग गीता का सत्रहवां अध्याय है, इसमें 28 श्लोक हैं। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि जो शास्त्र विधि का ज्ञान न होने से तथा अन्य कारणों से शास्त्र विधि छोड़ने पर भी यज्ञ, पूजा आदि शुभ कर्म तो श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है।

अठारहवां अध्याय
मोक्ष-संन्यास योग गीता का अठारहवाँ अध्याय है, इसमें 78 श्लोक हैं। यह अध्याय पिछले सभी अध्यायों का सारांश है। इसमें अर्जुन, श्रीकृष्ण से न्यास यानि ज्ञानयोग का और त्याग यानि फलासक्तिरहित कर्मयोग का तत्त्व जानने की इच्छा प्रकट करते हैं।