‘कलियुग के पापों का क्षय करने का साधन गीता’

निखिल दुनिया ब्यूरो।
भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन अर्जुन को मोक्ष प्रदायिनी भगवत गीता का उपदेश दिया था। ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसीलिए यह दिन गीता जयंती के नाम से जाना जाता है।
महाभारत के धर्म और अधर्म के युद्ध में कौरव और पांडवों की सेना आमने-सामने खड़ी हो गयी थी। मगर जब अर्जुन ने रण क्षेत्र के विरोधी खेमे में भीष्म पितामह, कृपाचार्य और अपने रिश्तेदारों को खड़ा देखा तो अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया। तब अर्जुन ने अपने रथ के सारथी श्रीकृष्ण से कहा कि अपने स्वजनों और बेगुनाह सैनिकों को मारकर वह जीत हासिल नहीं करना चाहता है और अंत में अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र जमीन पर रख दिए थे। तब संशय ग्रस्त अर्जुन का मोह भंग करने के लिए गीता का जन्म हुआ। लगभग 40 मिनट तक श्रीकृष्ण और अर्जुन में जो संवाद हुआ, वही गीता है।
गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया था कि उसके शत्रु तो महज मानव शरीर हैं। अर्जुन तो सिर्फ मानव शरीर का अंत करेगा, आत्माओं का नहीं। हताहत होने के बाद सभी आत्माएं उस अनंत आत्मा में लीन हो जाएंगी। शरीर नाशवान है मगर आत्मा अजर-अमर है। आत्मा को न तो शस्त्र से काटा जा सकता है और ना ही जलाया जा सकता है।
गीता ज्ञान का अनुपम भंडार है। हम सब हर काम में तुरंत परिणाम चाहते हैं। लेकिन भगवान ने कहा है कि धैर्य के बिना अज्ञान, दुख, मोह, क्रोध, काम और लोभ से निवृत्ति नहीं मिलेगी। गीता केवल ग्रंथ नहीं, कलियुग के पापों का क्षय करने का अनुपम और अद्भुत माध्यम है।
दुर्लभ मानव जीवन हमें केवल भोग विलास के लिए नहीं मिला है, इसका कुछ अंश भक्ति और सेवा में भी लगाना चाहिए। गीता भक्तों के प्रति भगवान द्वारा प्रेम में गाया हुआ गीत है। अध्यात्म और धर्म की शुरुआत सत्य, दया और प्रेम के साथ ही संभव है। ये तीनों गुण होने पर ही धर्म फलता-फूलता है। जीवन उत्थान के लिए गीता का स्वाध्याय हर व्यक्ति को करना चाहिए।