गोग्रास से गोरक्षा

बड़े-बड़े तीर्थों में स्नान करने, दक्षिणा सहित ब्राह्मणों को भोजन कराने, व्रत, उपवास तथा कठिन तपों के आचरण से भूदान, अन्नदान, कन्यादान, सर्वस्वदान जैसे महान दान करने से समस्त प्रकार के मंगलों को प्रदान करने वाले करूणा वरूणालय श्री नारायण की पंचोपचार, षोडशोपचारों से पूजन करने से, तीर्थयात्रा, सत्यवचन तथा अश्वेधादि महान यज्ञों का आयोजन करने से मनुष्य को जो फल मिलता है। वह सब का सब गोमाता की सेवा करने से, गोमाता को तृण खिलाने से तत्काल प्राप्त हो जाता है।

कितने आश्चर्य की बात है कि ऐसी अनंत पुण्य प्रदायिनी, अनायास ही समस्त धर्म-कर्म का फल प्रदान करने वाली, थोड़ी सी सेवा से संतुष्ट होकर मनोवांछित फल देने वाली गोमाता तिरस्कृत हो रही है। बुद्धिमान, शास्त्रों का अनुशीलन करने वाले सज्जनों को गोग्रास की व्यवस्था करनी चाहिए। एक ओर समस्त धर्म-कर्म, तप-व्रत, जप-यज्ञ दानादि क्लिष्ट कर्म जिनके संपादन में विशेष योग्यता अपार धन और अनेक मनुष्यों के सहयोग तथा विशेष परिश्रम की आवश्यकता है। उस पर भी यदि कुछ त्रुटि रह जाए, दोष हो जाए तो सब किया कराया निष्फल हो जाएगा तथा दूसरी ओर गोग्रास का दान। जिसमें न तो कुछ परिश्रम चाहिए, न योग्यता न धन और न ही सहयोग। सहज आचरण करके थोड़े से ही संतुष्ट होने वाली कामधेनु स्वरूपा गोमाता की कितनी अधिक महिमा है।

ऐसी महान पुण्यदायिनी गोमाता की सेवा का अवसर प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त हुआ है। ऋषियों ने गोग्रास की व्यवस्था हमें प्राचीनकाल से ही प्रदान की है। आज का सभ्य समाज गोग्रास की परंपरा को भूलता जा रहा है। हम कृतघ्नी हो गए हैं। जिसके दूध-घी से पुष्ट होकर हमारे शरीर का निर्माण हुआ और उसमें बल व आरोग्यता का संचार हुआ। जिसके गोमय से भूमि उर्वर बनी और समृद्ध हुई। जिसके बेटे ने (बैल) ने परिश्रम के भूमि को अन्न उपजाने के योग्य बनाया। उसे जल से सिंचित किया। जिसके घृत से किए गए यज्ञ का पर्जन्य आकाशस्थ होकर होकर वृष्टि का कारक बना उस अन्न-जल की परम कारण स्वरूपा गोमाता का दिया हुआ अन्नादि खाने से पहले प्रत्येक मनुष्य का कत्र्तव्य  है कि वह उस गोमाता के अनंत उपकारों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए पहला ग्रास, भोजन का प्रथम भाग गोमाता को समर्पित करें।

वास्तव में इस अन्न पर प्रथम अधिकार गोवंश का ही है। गोग्रास निकाले बिना जो भोजन करता है, वह कृतघ्नी होता है। यहां तक कि श्री भगवान को नैवेद्य अर्पण करने से भी पहले गोग्रास निकाल देना चाहिए। आज चारों ओर पृथ्वी कंपायमान हो रही है। गोहत्या के महान पाप से क्षुब्ध होकर भूमि अन्न नहीं उपजा रही है। पृथ्वी का सम्पूर्ण रस अवशोषित हो गया है। समय पर वृष्टि नहीं होती, ऋतुएं समय पर नहीं बदलती। पापाचार, अत्याचार अनाचार बढ़ रहा है। मनुष्यों की बुद्धि कलुषित होकर भोग और संग्रह में अत्यंत आसक्त हो रही है। यज्ञादि धर्मानुष्ठान फलीभूत नहीं हो रहे हैं। तप-तप-व्रतादि निष्फल हो रहे हैं।

जिस शुभ कर्म का जैसा फल शास्त्रों में लिखा है। वह प्राप्त नहीं हो रहा है। ऐसी सभी अनर्थों का मूल कारण है गोहत्या-गो का तिरस्कार। जब तक मनुष्य इस महान कलंकित पाप कर्म से अपने को नहीं बचाएगा तब तक वह महान विनाश की गर्त में पतित होता चला जाएगा। अतः प्रबुद्ध वर्ग के आवाहन पर जागृत होकर प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वाभाविक कर्म में रत होकर विशेष प्रयत्न से गोरक्षा करना चाहिए। सुबह-शाम भोजन के पूर्व गोमाता को अपने हाथों से गोग्रास खिलाकर उसे नमस्कार करके प्रदक्षिणा करना चाहिए। उसके उपरांत ही भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से गोमाता के प्रति कृतज्ञ व्यक्ति को सर्वविध कल्याण की प्राप्ति होती है। उसके जीवन के समस्त अशुभ नष्ट हो जाते हैं। उसके द्वारा सृष्टि की बहुत बड़ी सेवा हो जाती है।