हैप्पी न्यू इयर लेकिन कौन सा?

प्रो. गोविन्द सिंह। वर्ष 2017 भी तमाम उतार-चढ़ावों के बाद आखिर अलविदा हो ही गया और 2018 भी आ गया. युवावस्था में जो उत्साह नए वर्ष को लेकर मन में रहता था, अब नहीं होता.  रह-रह कर बचपन के दृश्य आँखों के सामने आने लगते हैं. मेरी उम्र आठ-दस साल रही होगी, जब नव वर्ष प्रतिपदा या संवत्सर पड़वा के दिन हमारे गाँव में हम लोगों के पुरोहित पंडित जी आया करते थे.

पहले नारायण दत्त ज्यू, या लीलाधर ज्यू और बाद में भगीरथ ज्यू. चैत्र के महीने की शुरुआत में. वे बताते थे कि आज से नया वर्ष आरम्भ हो गया है. साथ ही यह भी बताते थे कि कलियुग को शुरू हुए कितने हजार वर्ष हो चुके हैं और कितने हजार या लाख वर्ष अभी बाक़ी हैं. हम बच्चों की बाल-सुलभ चेष्टा आश्चर्य में पड़ जाती. बड़ा ही कौतूहल होता कि कैसी विचित्र दुनिया है. हम लोग पंडित जी से कई सवाल पूछते कि फिर उसके बाद क्या होगा? प्रलय को कितने वर्ष बाक़ी हैं? आदि-आदि. पंडित जी अंत में कहते कि प्रलय अभी बहुत दूर है. चिंता की बात नहीं. खूब पढ़ो-लिखो.

यानी जिस देश के पास काल-गणना की हजारों साल पुरानी समृद्ध परम्परा हो, उस देश के वासे हम लोग दो हजार साल पुराने ग्रेगोरियन कैलेण्डर को ही सबकुछ मान बैठे हैं. हमारे कैलेण्डर की शुरुआत उस दिन से होती है, जिस दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की शुरुआत की थी. ब्रह्मा जी का एक घंटा, एक दिन और एक वर्ष की गणनाएं भी आपने सुनी होंगी, जिनसे पता चलता है कि इस ब्रह्माण्ड की कितनी उम्र है. हमारे नव वर्ष के साथ कुछ और भी कहानियां जुड़ी हुई हैं; यथा, मर्यादा पुरूषोत्‍तम श्रीराम का राज्‍याभिषेक, मॉं दुर्गा की उपासना की नवरात्र व्रत का प्रारम्‍भ, युगाब्‍द (युधिष्‍ठिर संवत्) का आरम्‍भ, उज्‍जयिनी सम्राट- विक्रमादित्‍य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्‍भ, शालिवाहन शक् संवत् (भारत सरकार का राष्‍ट्रीय पंचाग), शक्ति संप्रदाय’ के अनुसार इसी दिन से नवरात्रि का शुभारंभ होता है, सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ, भगवान श्री विष्णु ने भी मत्स्यावतार इसी दिन लिया आदि.

अपने देश में नया साल अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग दिन शुरू होता है. आम तौर पर जनवरी से अप्रैल के बीच ही हिन्दुओं के नव वर्ष आरम्भ होते हैं. हमारे कैलेंडरों का सम्बन्ध आम तौर पर कृषि और ऋतुओं से रहा है. इसलिए देश के अलग-अलग हिस्सों में तीज-त्यौहार भी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ही तय किये जाते हैं. इस्लाम का कैलेंडर चन्द्रमा की गति पर निर्भर रहता है. काल गणना भी चन्द्रमा की ही तरह साल भर घूमती रहती है. इसलिए कभी रमजान का महीना गर्मियों में पड़ता है तो कभी सर्दियों में. कभी खाने-पीने यानी त्यौहार मनाने का माहौल बहुत खुशनुमा होता है तो कभी बड़ा उबाऊ. छोटे दिन होने पर लोग खुश रहते हैं, लम्बे दिनों में परेशान. खैर कहने का मतलब यह है कि इस देश में हिन्दुओं का नया साल चैत्र-बैशाख में आयेगा तो मुसलमानों का किसी और महीने में. सिखों के नानकशाही कैलेंडर के मुताबिक़ 14 मार्च को होला मोहल्ला के दिन नए वर्ष की शुरुआत होती है तो पारसियों का नया साल नवरोज के दिन लगभर जनवरी-फरवरी में ही आता है. जबकि ईसाईयों का कैलेंडर सदैव एक जनवरी से शुरू होता है. सवाल यह पैदा होता है कि जब 95 फीसदी जनता का नया वर्ष एक जनवरी से शुरू ही नहीं होता तब क्यों ये ताम-झाम होती है?

इसका एक ही उत्तर है. हमारी दास मनोवृत्ति. चूंकि दुनिया के बड़े हिस्से पर कभी यूरोपीय देशों का कब्जा रहा, इसलिए इसाई कैलेंडर को मान लिया गया. हमने संविधान में अपना राष्ट्रीय कैलेंडर शालिवाहन शक को अंगीकृत किया है, लेकिन सरकारी कैलेंडर के अलावा हम उसे नहीं जानते. या शादी-व्याह या पूजा-पाठ के लिए ही हमें अपने स्वदेशी कैलेंडर की याद आती है. यह ठीक वैसा ही है, जैसे देश की राजभाषा तो हिन्दी है लेकिन कामकाज होता है अंग्रेज़ी में. सवाल सिर्फ एक नए साल के दिन का नहीं है. सवाल यह है कि इसके साथ ही आप के ऊपर एक अलग संस्कृति थोपी जाती है. नए साल का जश्न होता है. होटलों में मौज-मस्ती मनाई जाती है, जबकि अपने युगादी के दिन पवित्र भाव से पूजा पाठ की जाती थी. फिर नए साल का दिन ही क्यों? कैलेंडर के बाकी दिन, तीज-त्यौहार भी साथ में चले आते हैं. आज वसंत को कोइ याद नहीं करता जबकि वैलेंटाइन का बखूबी इंतज़ार करने लगे हैं. जो दुनिया भर के ‘डे’ मनाये जा रहे हैं, वे सब पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार नहीं तो और क्या हैं? इस तरह हम धीरे-धीरे अपनी संस्कृति और जड़ों के कटते चले जा रहे हैं. और खुद को पश्चिमी बनाने और दिखलाने में गर्व का अनुभव करते हैं. इसलिए नए वर्ष पर हम हैप्पी न्यू इयर जरूर कहें लेकिन अपने नव वर्ष को भी भूलें नहीं. अपने बच्चों को भी अपनी जड़ों से परिचित करवाएं. साथ ही यह भी सोचें कि यह कब तक चलता रहेगा?                                             (लेखक जाने-माने स्तंभकार हैं)