हम बिखर गए हैं

काका हरिओम
निखिल दुनिया ब्यूरो।

हम बिखर गए हैं, क्योंकि हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर, बिना किसी विशिष्ट तथ्यों के, एक पूर्वाग्रह युक्त दृष्टिकोण को सामने रखकर प्रस्तुत किया गया है। इस कार्य में यदि अशिक्षित या नासमझ लोग सम्मिलित होते तो उन्हें माफ किया जा सकता था, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि भारत के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने एक सुनिश्चित नीति के अंतर्गत परोक्ष या अपरोक्ष रूप में ऐसी विचारधारा का समर्थन किया, जिसने भारत के उजले पक्ष को लोगों के सामने ही नहीं आने दिया।
क्या यह सच नहीं है कि आज भी एक वर्ग इस संभावना को नकारता है कि भारत का कभी गौरवशाली अतीत रहा है. उसने जितना विश्व से लिया है, उससे कहीं ज्यादा मानवता को दिया भी है।

आजकल एक पाखंड समूचे विश्व के बुद्धि-जीवियों में व्याप्त है।वह हमारे भारतीय, वैदिक चिंतन को बिल्कुल नया और अपना कह कर लोगों के बीच परोस रहे हैं, उन्हें यह बताने में शर्म आती है कि उसका मूल स्रोत क्या है, उसे उन्होंने कहां से लिया है. यदि किसी का नाम लेते भी हैं,  तो किसी विदेशी का,  भारतीय का नहीं।

आप जानते हैं कि हमारे देश का नाम भारत क्यों है। भारत का अर्थ है, जिसने ज्ञान को सम्मान दिया है। जो ज्ञान के लिए अपना सर्वस्व–भौतिक सुख त्यागने को तैयार है। जिसने ज्ञान प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया है। जिसने अलौकिक को चमत्कार नहीं, बल्कि प्रकृति की साधना का परिणाम माना है। ऐसे विशिष्ट ज्ञान को भारतीय मनीषी (ऋषि) विज्ञान कहते हैं। क्या आप जानते हैं, कि प्रत्येक विचारधारा अपने कथन की पुष्टि जिस ग्रंथ से करती है, उसका नाम वेद है. वेद अर्थात ज्ञान। यह ज्ञान परमात्मा का ज्ञान है, इसीलिए इसे अपौरुषेय कहा गया है। इसमें त्रुटि की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि इसे प्रकृति से लिया गया है।

इसका साक्षात्कार ऋषियों ने उस समय किया, जब वे भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर समाधिस्थ हुए। इसमें बुद्धि से परे विद्यमान सत्य का वर्णन है। जिस तरह अन्य पंथों ने प्रमाण के रूप में किसी एक ग्रंथ को, मूल रूप से मान्यता दी हुई है, उसी तरह आर्यों का ग्रंथ है वेद। आज इस बात की पुष्टि हो चुकी है, कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसे भी अब विद्वान स्वीकार कर रहे हैं. बुद्धि की कसौटी पर कि, विश्व में व्याप्त सभी प्रमुख मत-मतांतरों, संप्रदायों धर्मों के मूल सूत्र वेदों से ही लिए गए हैं। अपनी संस्कृति और विरासत को समझने के लिए जरूरी है कि हम वेदों का अध्ययन करें।

एक शिक्षक होने के नाते हमें इस बात की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए कि शिक्षा और विद्या में क्या अंतर है। सामान्य रूप से इन दोनों को हम एक ही समझ लेते हैं। लेकिन गहरा अंतर है इन दोनों में। शिक्षा का अर्थ है ज्ञान की एक विधा। इसके बाद और बहुत कुछ जानना शेष रह जाता है। इसके द्वारा एक विशेष क्षेत्र की जानकारी हमें होती है, उसके अलावा हमसे अछूता रहता है। जबकि विद्या का अर्थ है जीवन के मूलभूत प्रश्नों को जान लेना। ईश्वर, प्रकृति और जीवन के बारे में जानने से अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

एक आम आदमी को लगेगा कि शिक्षा से तो उसे मान-सम्मान, यश पद के साथ ही सुख के भौतिक साधनों को जुटाने के लिए धन की प्राप्ति होगी, लेकिन ईश्वर जैसे प्रश्नों पर माथापच्ची करने पर उसे क्या मिलेगा, अर्थात् वह इस पर अपने समय को खर्च करने की कोई सार्थकता नहीं समझ पाता है। इसीलिए धार्मिक स्थलों पर लोगों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है। धार्मिक आयोजनों की सार्थकता पर एक तरह से प्रश्न चिन्ह ही है जो लोगों मेंं कम होती जा रही है।

जहां भीड़ दिखाई दे रही है, वहां सत्य से हटकर झूठ का सहारा लिया जा रहा है। अर्थात् धर्म के नाम पर पाखंड का आचरण हो रहा है। इसीलिए लोग दिशाहीन हो रहे हैं। धर्मगुरु मनमानी मान्यताओं में लोगों को उलझा रहे हैं। माना की नर्सरी-केजी के बच्चों के लिए एक अलग तरह के पाठ्यक्रम की आवश्यकता होती है. जिसकी रूपरेखा मानने से जानने पर आधारित होती है, लेकिन उतना ही तो सत्य नहीं है। मानने और जानने के अंतर को मिटा देना भूल ही तो है। आजीवन यदि कोई प्राईमरी में ही रहे, तो आप क्या कहेंगे। विद्यार्थी, शिक्षक और विद्यालय पर इससे प्रश्नचिन्ह लगेगा या नहीं।

तो केवल भावना से जीवन के लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता, उसके लिए तर्कशील बुद्धि तथा वैज्ञानिक सोच की जरूरत है। ठीक है, केवल तर्क से सत्य का अनुभव नहीं होता, लेकिन इसके बिना भी झूठ को सच के रूप में स्वीकार लेने की संभावना बनी रहती है। आप शिक्षक है, आपको स्वयं में और विद्यार्थियां की तर्कशील बुद्धि और वैज्ञानिक सोच का विकास करना चाहिए। आपने बच्चों के संपूर्ण विकास का संकल्प लिया है, उसके लिए स्पष्ट विचारों और पारदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इस रूप में आपके द्वारा पढ़ाया गया सार्थक है। इसी प्रक्रिया से शिक्षा का रूपांतरण और परिष्कार विद्या के रूप में होता है।

आपके संकल्प पूर्ण हों, इसके लिए मेरी शुभकामनाएं। अंत में एक बार फिर सत्य सर्वोपरि है, उसके लिए सर्वोच्च का त्याग करने में संकोच न करें। स्वामी दयानंद जीए स्वामी रामतीर्थ जैसे महापुरुषों ने आजीवन इसी बात पर बल दिया है. इसीलिए ऋषि कहते हैं, सत्यमेव जयते। शिक्षक में यही निष्ठा होनी चाहिए।