अमरता कोई बाह्य पदार्थ नहीं!

नीरजा माधव। आजकल एक चर्चा है, वैज्ञानिकों ने अमरता का सूत्र खोज लिया है जिससे मनुुष्य एक हजार वर्षों तक जीवित रह सकता है। किसी को आश्चर्य हो, तो हो, हम भारतीय दर्शन और प्राचीन साहित्य के अध्येताओं को नहीं हुआ क्योंकि रामायण में उल्लेख है कि राम ने एक हजार वर्षों तक राज्य किया। ‘शिवपुराण’ की रुद्र संहिता में वर्णन है कि भगवान शिव ने शुक्राचार्य के तप से प्रसन्न होकर मृत संजीवनी विद्या का वरदान दिया। कहा जाता है कि शुक्राचार्य ने काशी में आकर पाँच हजार वर्षों तक विश्वनाथ जी की आराधना की।

इतने वर्षों की तपस्या के बाद भी जब भगवान आशुतोष शिव प्रसन्न नहीं हुए तो शुक्राचार्य हजार वर्षों तक अपने चित्त को निर्मल करने का कठिन व्रत करते रहे और पूर्ण रूप से परिष्कृत अपने उस चित्त-रत्न को भगवान शिव की सेवा में समर्पित कर दिया। शिव प्रसन्न हुए और उन्हें मृत संजीवनी विद्या का अमोघ वरदान दिया जिसका समय समय पर दैत्यों आदि को जीवित करने के लिए शुक्राचार्य ने उपयोग किया। इतना ही नहीं, शिव उन्हें शुक्र तारा केे रूप में अमरता प्रदान करते हैं और नौ ग्रहों में प्रधान स्थान देते हैं।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि हजार वर्षों या छः हजार वर्षों की आयु को प्राप्त कर लेने को भारतीय दर्शन में अमरता नहीं माना गया है क्योंकि उसके बाद तो इस लौकिक देह को नष्ट होना ही है। अमरता कोई दृश्य या इन्द्रियग्राह्य बाह्य पदार्थ नहीं हैं। एक और दृष्टान्त के द्वारा बात को सम्पुष्ट करती हूँ- योगस्थ शिव कामदेव को भस्म करते हैं। रति के विलाप और तत्पश्चात् आराधना से प्रसन्न होकर कामदेव को ‘‘अनंग’’ होने का वरदान देते हैं। अनंग अर्थात् जो अंगों से रहित हो, यानी भावरूप। शिव कामदेव को जीवित करते हुए उस अनंग रूप में सभी प्राणियों के हृदय में बसने का वरदान देते हैं। कामदेव आनन्द बन सभी प्राणियों के भीतर बसता है। यह भी अमरता है मृत्यु को जीतना है।

ऋग्वेद के सातवें मण्डल के सूक्त संख्या उनसठ (59) के बारहवें मन्त्र को मृत्युंजय मन्त्र अथवा महामृत्युंजय मन्त्र कहा गया है.

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

अर्थात् हम सभी सुरभित पुष्टिवर्धक त्र्यम्बक की आराधना करते हैं। हे रुद्र! हमें मृत्यु के पाश से उसी प्रकार छुड़ाओ, जैसे पक जाने पर ककड़ी की लता स्वयं उससे अलग हो जाती है। हे रुद्र! तुम हमें मृत्यु के पाश (बन्धन) से मुक्त करो परन्तु अमृतत्त्व (अमरता) से मुक्त मत करना।

उपर्युक्त का तात्पर्य तो यही हुआ कि मृत्यु से अलग है अमरता। केवल लौकिक जीवन यापन को भी अमरता नहीं माना जा सकता क्योंकि जहां समय सीमा के बाद नश्वरता (मृत्यु) है, वह अवधि लम्बी चाहे कितनी भी हो, अमर (जहाॅं मृत्यु न हो) नहीं कही जा सकती। इस अमरता को समझने के लिए हमें भारतीय सनातन दर्शन में थोड़ा गहरे उतना होगा।

सामान्य तौर पर मनुष्य को मृत्यु का भय सर्वाधिक सताता है। जन्म की तिथि से ही मृत्यु की काल गणना शुरू हो जाती है। अज्ञानता से घिरा वह सुख, आरोग्य, ऐश्वर्य आदि की छाया में स्वयं को सुरक्षित करता फिरता है, फिर भी छाया तो छाया ही है। काल का अट्टाहास सुनाई पड़ता ही है। इसी मृत्यु के ऊपर वास्तविक विजय प्राप्त करने का साधन बताते हैं हमारे प्राचीन वाङ्मय। ऋषियों ने अपनी कठोर साधना के द्वारा इन साधनों को ढूंढ निकाला और ऋचाओं अथवा मन्त्रों के अन्वेषक बने।

कालक्रम में लोगों ने उसे कपोल-कल्पना माना परन्तु सुखद है कि धीरे-धीरे आधुनिक मानव की वैज्ञानिक खोज ने उन तथ्यों को पुनः सम्पुष्ट कर रही हैं। तो चर्चा पर पुनः आती हूँ। सबसे पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि मृत्यु क्या है। क्या दिखाई देने वाले इस शरीर का अन्त हो जाना ही मृत्यु है अथवा इससे परे भी इसका कोई अस्तित्व है। मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है अथवा कुछ शेष भी रह जाता है। यदि शेष रहा तो कैसे जानें कि क्या शेष रहा। इस बिन्दु पर भारतीय दर्शन में दो विचारधाराएॅं सामने आती हैं.

एक, आस्तिक और दूसरी नास्तिक। नास्तिक सम्प्रदाय मानता है कि पंचतत्त्वों से निर्मित शरीर का आंशिक अथवा सर्वांश विघटन ही मृत्यु है। उनका मानना है कि भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः, अर्थात् मृत्यु के उपरान्त उस शरीर से सम्बन्ध रखने वाला कोई तत्त्व शेष नहीं रहता जो बुरे भले कर्मों का उपभोग करे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जब तक शरीर में प्राण वायु का संचार रहता है, तब तक प्राणी जीवित कहा जाता है और इस प्राणवायु का शरीर से सम्पर्क समाप्त होते ही व्यक्ति मृत माना जाता है। यहीं से आस्तिक विचारधारा का अस्तित्त्व भी स्पष्ट होता है। यदि जीवन और मृत्यु का कोई पूर्व और परोक्ष कारण नहीं है तो प्रत्येक मनुष्य को समान रूप और आयु वाला होना चाहिए। विषमता क्यों उत्तर हो सकता है.

देश, जलवायु, खानपान और आर्थिक परिस्थितियों की विषमता के कारण ऐसा होता है। परन्तु जन्म से ही नेत्रहीन, मूक, बधिर आदि विकलांगता के क्या कारण हो सकते हैं, पुनः उत्तर मिल सकता है. माता पिता के रक्त अथवा वीर्य विकारों के कारण। पुनः प्रश्न सिर उठाता है। आखिर एक ही माता पिता की सन्तानों में कोई एक या दो ही विकलांग क्यों शेष स्वस्थ भी होते हैं। उनमें वह ऐन्द्रिय दोष नहीं भी होता। यहीं पर आकर स्पष्ट हो जाता है कि प्राणी के जन्म और मृत्यु में प्राणों के संसर्ग के साथ ही कुछ और भी तत्त्व हैं जो प्राण के सहचर या अनुगामी हैं। यही तत्त्व इस देह से देहान्तर और लोकान्तर प्राप्त करने की क्षमता रखता है।

पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, प ́च प्राण, मन और बुद्धि. इन सत्रह तत्त्वों से निर्मित जीव कर्मानुसार शरीरान्तर गमन आगमन करता रहता है। इनसे संयुक्त शरीर का ग्रहण जन्म और उस शरीर का त्याग ही मृत्यु है।

ऋग्वेद एवं परवर्ती साहित्य में एक सौ एक प्रकार मृत्युओं का उल्लेख है। स्वाभाविक मृत्यु वृद्धावस्था के कारण आती है। अन्य सौ मृत्युओं से बचने के लिए कहा गया है क्योंकि वृद्धावस्था के कारण नहीं हैं। इस प्रकार अस्वाभाविक हैं। अमर होने का तात्पर्य दीर्घकाल तक इस शरीर को लेकर जीना नहीं है, अपितु इस प्रकार जीना कि मृत्यु मृत्यु न लगे। उसका भय समाप्त हो जाय।

व्यक्ति किसी शत्रु से (मृत्यु) भयभीत हो और अकस्मात् उस शत्रु पर विजय प्राप्त हो जायेए वह उसके नियन्त्रण में हो जाय तो एक सुखद आश्वस्ति और निर्भयता के आनन्द से वह भर उठता है। इसीलिए भारतीय मनीषा ने मृत्यु को जीवन का अन्त नहीं अनन्त जीवन का प्रवेश द्वार माना है।

मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने और अमरता की प्राप्ति की कामना भारतीय प्राचीन वाङ्मय  में उसी त्र्यम्बक रुद्र से की गई हैए जो शिव है, आशुतोष है, मृत्यु ́जय है। वही शिव जो स्वयं जन्म मृत्यु से परे, अनादि, अनन्त परब्रह्म है। वे सबके कारण हैं, उनका कोई कारण नहीं है। वे सबमें व्याप्त हैं, परन्तु अज्ञानतावश मनुष्य स्वयं को उनसे भिन्न समझता है। जैसे व्यापक अग्नि तत्त्व प्रत्येक काष्ठ में होती है, घृत दुग्ध में होता है, पर दिखाई नहीं पड़ता। उसके मन्थन करके
प्रगट करना पड़ता है। जो मन्थन करता हैए वही उसका साक्षात्कार करता है। इसीलिए आत्म साक्षात्कार ही परम तत्त्व का ज्ञान हैए और अमरता इसी ज्ञान-मन्थन से उत्पन्न एक अन्तहीन चैतन्य का सिलसिला। एक ही बीज (परमतत्त्व) पुष्पित पल्लवित होकर वृक्ष और फल आदि के रूप में परिणत होता है और पुनः बीज भाव को प्राप्त हो जाता है।

शिवतत्त्व ही बीज तत्त्व है जो बाहर भी है और भीतर भी। सृष्टि के आदि में भी है, मध्य में भी है और अन्त में भी है, जब सब कुछ शून्यता में परिवर्तित हो जाता है। उस समय भी शिव की सत्ता विराजमान रहती है, अव्यक्त के रूप में, असीम के रूप में। इसी बीज भाव का ज्ञान प्राप्त करना ही अमरता है। यह ज्ञान प्राप्त करने के लिएए स्वयं को परिष्कृत करने के लिए सौ वर्ष की आयु मिले, एक हजार वर्ष की आयु मिले, अच्छी बात है, परन्तु यह आयु अमरता नहीं है। अमरता तो कुछ और ही है।

सुसंस्कारों, जप, तप, यम, नियम, प्राणायाम आदि साधनों के द्वारा आयु दीर्घ करने की बातें हमारे प्राचीन वाङ्मय करते हैं। आयु बढ़ा लेने का उदाहरण आदि शंकराचार्य हैं, मारकण्डेय ऋषि हैं, नचिकेता हैं, मृत्यु को परास्त करने वाली सावित्री हैं। अनेक उदाहरण हैं। परन्तु यह समझना आवश्यक है कि अमरता प्राप्त करने के लिए दीर्घ आयु एक साधन है। ज्ञान के द्वारा जन्म मृत्यु के चक्र से छूट जाने और आदि शक्ति के नैरन्तर्य और अखण्डता का स्वरूप बन जाने का नाम अमृतत्त्व है। यही मोक्ष भी है।

नीरजा माधव
मधुवन

सारनाथ, वाराणसी.उ0प्र0