आत्मानुभूति का अवलम्ब (प्राणायाम)

स्वामी रामतीर्थ

प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ होता है-श्वासं का नियंत्रण। हिन्दुओं के योग ग्रंथों में श्वांस के नियंत्रण या नियमन की आठ प्रमुख विधियां बतायी गयी हैं। परन्तु राम इनमें से केवल एक ही विधि की-अर्थात् ‘प्राणायाम की व्याख्या करेगा। यह श्वांस-क्रिया के नियंत्रण की एक बहुत महत्वपूर्ण प्रणाली है। आप यह प्रश्न पूछ सकते हैं-‘श्वांस के नियंत्रण या नियमन की क्या आवश्यकता और उपयोगिता है़?’ इस प्रश्न के उत्तर में राम केवल यही कहेगा-कृपया आप पहले श्वांस-क्रिया के नियमन की यह विधा सीखिये और उसका अभ्यास कीजिये। आपका यही अपना अभ्यास यह प्रमाण देगा कि प्राणायाम कितनी अधिक उपयोगी और कितना अधिक लाभप्रद है। जब कभी आप भ्रम में प्रमत्त अपनी स्थिति का अनुभव करें, जब कभी आप अपने आपको कष्ट, दुःख, विषाद, उदासी, हीनता की भावना से ग्रस्त समझें या जब कभी आप यह महसूस करें कि आप बुझ गये हैं, आपकी सारी शक्ति जाती रही है, तभी आप प्राणायाम का अभ्यास कीजिये। इसी प्राणायाम की चर्चा राम आपसे करने वाला है।

प्राणायाम के अभ्यास से आप तुरन्त अनुभव करेंगे कि आप शान्त हैं, निश्चल हैं। आप उस समय श्वांस-क्रिया के नियमन की इस विधा की त्वरित उपयोगिता के बारे में आश्वस्त हो जायेंगे। इसी प्रकार जब आप किसी विषय पर लिखना प्रारम्भ करें, जब आप किसी विषय पर विचार करना आरम्भ करें और उस समय आप यह अनुभव करें कि आप अपने विचारों को केन्द्रित करने में असमर्थ हैं तो ‘प्राणायाम का अभ्यास कीजिये। फिर तो आपके सामने आपकी वे शक्तियां उद्घाटित होने लगेंगी, जिनका आपने प्राणायाम द्वारा संचय किया है। तभी हर चीज व्यवस्थित हो जायेगी। हर एक व्यक्ति सर्वाधिक अभीप्सित स्थिति में हो जायेगा। ये प्राणायाम के कतिपय लाभ हैं। प्राणायाम से आप अनेकानेक शारीरिक रोगों से मुक्त हो जायेंगे। आप पेट के दर्द से, हृदय के दर्द से, सिर के दर्द से प्राणायाम द्वारा निरोग हो जायेंगे।

अब आप देखेंगे कि यह प्राणायाम है क्या? राम आपको वह क्रिया बतायेगा जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है, जिसका प्रचलन भारत में अत्यन्त प्राचीन काल में सर्वाधिक था और जिसका अभ्यास आज भी किया जा रहा है। जिन लोगों ने इस प्राणायाम क्रिया का अत्यन्त प्राचीन समय से लेकर वर्तमान समय तक प्रयोग किया है, उन सभी ने इसे अत्यन्त लाभप्रद पाया है, उपयोगी सिद्ध किया है।

‘प्राणायाम’ का अभ्यास करने के लिए आपको चाहिये कि आप अत्यन्त आरामदेह, अत्यन्त स्वाभाविक स्थिति में बैठें। पद्मासन लगाकर बैठना अत्यन्त सुखकर स्थिति है। लेकिन कुछ लोगों के लिए पद्मासन अर्थात् एक पैर को दूसरे पैर पर रखकर बैठने का आसन दुःखद और कष्ट साध्य होगा। इसलिए ऐसे लोग आराम से कुर्सी पर बैठें। आप अपने शरीर को सीधा रखें, मेरुदण्ड या रीढ़ की हड्डी को कड़ा बनाये रखें, सिर ऊपर किये रहें, वक्ष-स्थल को आगे निकालें ओर नेत्र सामने केन्द्रित रखें। दाहिने अंगूठे को दाहिने नथूने पर रखें और बायें नथूने से धीरे-धीरे श्वांस अन्दर खींचे। जब तक यह क्रिया आपको आसान लगे तब तक इसे करते रहें। श्वांस अन्दर खींचते समय मस्तिष्क को खाली न रखें, उसे विचार शून्य न बनायें। इस प्रकार श्वांस अन्दर खींचते समय आप आपने मस्तिष्क को इस विचार पर केन्द्रित होने दें कि आप सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ देवत्व को श्वासं क्रिया के माध्यम से अन्दर खींच रहे हैं, आप दिव्यात्मा का, ईश्वरत्व का, संपूर्ण विश्व का, सकल ब्रह्माण्ड का अनुपम रस-पान कर रहे हैं।

अब, जब आप यह समझें कि जितनी वायु को आप अन्दर खींच सकते हैं, उतनी वायु आपने ले ली है तब फिर बायें नथुने से उंगली से बन्द कर लें जिससे अभी तक आप श्वांस अन्दर ले जा रहे थे। इस प्रकार जब आप अपने दोनों नथुने बन्द कर लें तो अन्दर खींची गयी वायु को मुंह से निकालें, अन्दर खींची गयी वायु को आप अपने फेफड़ों में, पेट में, पेडू में भरी रहने दें, उस वायु से, जिसे आप अन्दर खींच कर ले गये हैं, अपने शरीर के सभी छिद्रों का परिपूर्ण होने दें। और जब यह वायु आपके अन्दर बनी हुई है तब भी आप अपने मस्तिष्क को इस विचार पर, इस सत्य पर केन्द्रित होने दें कि आप दिव्यात्मा हैं, आप सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं जो सभी में व्याप्त हैं।

जो विश्व के प्रत्येक कण-कण में, अणु-अणु में, हर वस्तु में परिपूर्ण हैं, समरस हैं। इस सत्य की अनुभूति कीजिए। इस सत्य का साक्षात्कार करने के लिए अपनी सारी शक्ति, सारी ऊर्जा लगा दीजिये, अपनी दिव्यात्मा का अनुभव करने के लिए अपनी पूरी ताकत का उपयोग कीजिये। ठीक जिस प्रकार आपके द्वारा अन्दर खींची गयी वायु से आपका शरीर परिपूर्ण है, उसी प्रकार इस तथ्य का साक्षात्कार कीजिये, इसकी अनुभूति कीजिए कि आप सत्य हैं, आप वह दिव्य शक्ति हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसका अनुभव कीजिये। आप इस विचार पर अपने मन को केन्द्रित करने का प्रयत्न करें।

जब आप समझें कि आप अपने द्वारा अन्दर खींची गयी वायु को और अधिक देरी तक नहीं रोक सकते हैं तो बांयी ओर के नथुने को बन्द रखें और दाहिनी ओर के नथुने को खोल दें तथा दाहिनी ओर के नथुने से धीरे-धीरे क्रमशः श्वांस को बाहर निकालें। इस स्थिति में भी आप अपने मस्तिष्क को खाली और विचार-शून्य न रखें, उसे काम करने दें। उसे यह अनुभव करने दे कि ज्यों-ज्यों यह वायु बाहर निकलती जा रही है त्यों-त्यों आपके पेट के विकारों को बाहर फेंका जा रहा है। इसी प्रकार सभी अशुद्धियों को, सभी अपवित्रताओं को, वह सब कुछ जो मलिन और गन्दा था, वह सब कुछ जो दुष्ट था ओर जो सभी बुराइयों की जड़ था, उस सब को तथा अन्य उसी प्रकार की अविद्या को बाहर निकाल कर फेंका जा रहा है, निष्कासित किया जा रहा है, परित्याग किया जा रहा है। अब सभी प्रकार की दुर्बलता चली गयी, अब कोई कमजोरी, कोई अविद्या, कोई अज्ञान, कोई भय, कोई चिन्ता, कोई कष्ट, कोई दर्द, कोई व्यथा, कोई क्लेश नहीं रह गये हैं, सब दूर हो गये हैं, सब समाप्त हो गये हैं, सभी छोड़कर भाग खड़े हुए हैं।

अब, जब आप अन्दर खींची गयी वायु को बाहर निकाल रहे हैं, और जब तक आप सावधानी से इस वायु को बाहर निकाल सकें तब तक आप इस वायु को बाहर निकालते रही रहें, ऐसा उस समय तक करते रहें जब तक आप सुविधाजनक रूप से यह सब कर सकते हो। जब आप यह सोचें कि अब आप अन्दर खींची गयी श्वांस को ओर अधिक बाहर नहीं निकाल सकते हैं तो दोनों ओर के नथुनों को खुला रख कर बाहर से वायु लेना बन्द कर दें। अपने हाथों को अपनी नाक पर मत रखें। कुछ समय तक वायु को अन्दर मत आने दें। ऐसा उस समय तक करते रहें जब तक आप ऐसा कर सकें। जब आपके प्रयत्नों द्वारा आपकी नाक के नथुनों द्वारा फेफड़ों में हवा को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है, उस समय भी आप अपने मस्तिष्क को काम करने दें और उसे यह अनुभव करने दें, अपने मस्तिष्क को इस सत्य का साक्षात्कार करने में अपनी पूरी शक्ति, पूरी सामथ्र्य लगाने दें कि यह तो असीम दिव्यात्मा है। जितना भी मैं देश और काल के बारे में सोच सकता हूं, वह सब तो मेरी अपनी वास्तविक आत्मा में समाहित है। इसकी अनुभूति कीजिए कि यह दिव्यात्मा देश, काल ओर कल्पना से परे है, विचारों से परे है, सब चीजों से परे है, हर वस्तु से परे है, वह सीमित नहीं है, हर चीज इस दिव्यात्मा  में सन्निहित है, हर वस्तु इस दिव्यात्मा से सीमित है। आत्मा, सत्यात्मा सीमित नहीं है। इसकी अनुभूमि कीजिए।

जिस प्रकार से आपके सामने प्राणायाम की व्याख्या की गयी है, उसमें आपने देखा होगा कि शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार की चार प्रक्रियायें इस प्राणायाम में सन्नहित हैं। पहली प्रक्रिया अन्दर श्वांस लेने की थी। यह श्वांस लेने की प्रक्रिया शारीरिक थी। इसके साथ जुड़ी थी मानसिक प्रक्रिया जिसमें इस विचार पर सोचने और इस विचार का अनुभव करने की यह विधा अपनाने, अपने मस्तिष्क पर इस विधा का प्रयोग करने और इस ओर अपनी सारी शक्ति लगा देने की यह भावना सर्वोपरि थी कि मैं ही दिव्यात्मा हूं, मुझमें ही दिव्यात्मा निहित है और इस दिव्यात्मा का मुझे साक्षात्कार करना है। इसके बाद जब आपने फेफड़ों में अपनी श्वांस को रोके रखा तो उसमें दोहरी प्रक्रिया थी, एक तो यह कि आपने अपने फेफड़ों में श्वांस रोके रखी और दूसरी यह कि आपने यह अनुभूति दी कि आप ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। तीसरी प्रक्रिया के अंतर्गत आपने अपने दाहिने नथुने से श्वांस को बाहर निकाला और अपनी सभी दुर्बलताओं को दूर फेंक भगाया, अपनी दिव्यात्मा में अपने आपको पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित, स्थापित और आसीन करने का दृढ़ संकल्प लिया और कभी भी किसी कमजोरी या आसुरी प्रलोभन का शिकार न बनने का निश्चय किया। इसके बाद चैथी प्रक्रिया के अंतर्गत् आपने अपनी श्वांस को बाहर ही रहने दिया। इस प्रकार इस चैथी प्रक्रिया के पूर्ण होने तक का अंश प्राणायाम का पूर्वाद्ध अभ्यास है। इस प्रकार आधी प्रक्रिया पूरी हुई है।