श्रद्धा का महत्व

संत विनोवा भावे का कथन है, ‘सद् विचारों पर बुद्धि केंद्रित रखने का ही नाम श्रद्धा है। यही श्रद्धा मनुष्य को बल देती है, सब प्रकार से प्रेरणा देती है और जीवन को सार्थक बनाती है। महाकवि तुलसीदास ने मानस में भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा-विश्वास रुपिणौ कहकर विश्वास को शिव की और श्रद्धा को पार्वती की उपमा दी है, जो सदैव साथ-साथ रहते हैं। इनकी सहायता के बिना अपने अंतस में विद्यमान परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते। विश्वास में निश्चय का भाव है। विश्वास होने पर मन भटकता नहीं। एक निर्धारित मार्ग पर चलने का निर्णय ले लेता है।

सांसारिक प्रयोजनों में सफलता के सोपानों तक जाने के लिए ज्ञान और कर्म का समन्वय ही पर्याप्त है, पर अध्यात्म इससे एक सीढ़ी की ऊंचाई पर है। उसके लिए एक विशेष अवलंबन श्रद्धा का भी होना चाहिए। इस संदर्भ में गीता का कथन है कि मनुष्य श्रद्धा पर अवलंबित है। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही बन जाता है। जिसने स्वयं को दुष्ट, अनाचारी व मूर्ख आदि मान रखा है, उसके वही गुण और वही लक्षण उभर-उभरकर प्रत्यक्ष आते रहेंगे। इसी प्रकार जो अपने संबंध में संत, सज्जन और श्रेष्ठ होने की मान्यता बना लेता है, उसकी वही विशेषता उभरती हुई क्रियान्वित होती दृष्टिगोचर होती है।

श्रद्धा के अभाव में गंगा एक नदी, हिमालय बर्फ और पत्थरों का समुच्चय और मूर्ति मात्र खिलौना और गुरु सामान्य स्तर का मानव मात्र है। तब भगवान भी प्रकृति व्यवस्था का एक अदृश्य नियम भर मालूम देता है। श्रद्धा वास्तव में प्राण है और स्वरूप उसका कलेवर। श्रद्धा न हो तो भैंस व गाय में कोई अंतर नहीं रह जाता। मंत्र भी अक्षरों का समुच्चय प्रतीत होते हैं।

एक संत गंगा तट पर रहते थे। नाव न होने पर पार जाने वालों के कान में राम मंत्र बता देते और कह देते, इसे जपते हुए गंगा पार कर जाना। कुछ दूर पर एक फकीर रहते थे, वे भी ऐसा ही चमत्कार दिखाते। उतरने वालों को खुदा का नाम लेने को कह देते, वे भी सब पार हो जाते। एक चतुर व्यक्ति ने दोनों का भेद जाना और दोनों का सम्मिश्रण कर और भी अधिक आसानी से पार निकलने का हिसाब लगाया। वह राम-खुदा कहता हुआ पार जाने का प्रयत्न करने लगा और बीच गंगा में डूब गया। शक्ति शब्दों में नहीं, उनके साथ जुड़ी भावना शक्ति में श्रद्धा के सम्पुट में होती है।