भगवान कृष्ण: गोरक्षा क्रांति के प्रवर्तक

परात्पर परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के माध्यम से गौओं के प्रति अपनी भक्ति को सिद्ध किया है। स्वयं श्रीकृष्ण ने यह प्रार्थना की है कि ‘गवां मध्ये वसाम्यहम’। वेद का वचन भी यही है, ‘ईश्वरः स गवां मध्ये।’ इस गोविन्द, गोपाल की सच्ची भक्ति गोसेवा ही है। जो श्रीकृष्ण की भक्ति करते हैं, उन्हें देहत्याग के अनन्तर गोलोक की प्राप्ति होती है। इसलिए श्रीकृष्ण की प्राप्ति का सरलतम साधन गोसवा एवं गोभक्ति है। सभी भगवत् भक्तों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर यही संकल्प करना चाहिए कि हम तन, मन, धन से गोसेवा में तत्पर रहेंगे। गोवंश के संरक्षण और संवर्द्धन में सहयोग करके श्रीकृष्ण की प्रसन्नता को प्राप्त करेंगे। इसी में जीवन की सफलता है। तो आईए जानतें हैं भगवान श्रीकृष्ण की गोभक्ति पर स्वामी विशुद्धानंद महाराज का लेख-

वेदवाणी में जिस गौ माता को अघन्या-अवध्या बताया गया है, जो सृष्टि चक्र के सम्पूर्ण अंगों को ओज, बल एवं पुष्टि प्रदान करने वाली है। जो प्राणियों के जीवन का अवलम्बन है, जिसमें सत्य का वास है उस अपनी परमकृति की रक्षा हेतु उसके संवर्द्धन-संरक्षण एवं महिमामण्डन हेतु स्वयं स्रष्टा भी तत्पर रहते हैं। जो इस विश्व व्यापार के सर्जक-पालक हैं वे ही अपनी रचना में सुव्यवस्था बनाये रखने हेतु गो एवं धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होकर मर्यादा की स्थापना करते हैं। यूं तो परमात्मा के सभी अवतारों का प्रायोजन ‘विप्र धेनु सुर संत हित’ ही है। लेकिन गोवंश के प्रति अपने विशेष प्रेम एवं उसकी महत्ता की स्थापना के लिए भगवान ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया।

कंस की दुष्टता से प्रजा पीड़ित थी। गोपालकों को समस्त दूध, दही, घृत कंस के राज्य के पहलवानों, असुरों और राक्षसों की सेवा में भेजना अनिवार्य था। बालक व गोवत्स दूध, घृतादि से वंचित होकर दुर्बल एवं क्षीण हो रहे थे। यज्ञ के लिए भी गोघृत उपलब्ध नहीं होता था, जिसके कारण देवशक्तियां भी क्षीण होेने लगी थी। ‘मैं ही भगवान हूं’ ऐसी घोषणा करके कंस ने अपने अनुयायियों द्वारा यज्ञ पर रोक लगा दी थी।
राजवेशधारी असुरों के उत्पात से पृथ्वी कम्पायनमान होकर भगवान नारायण की शरण में गई। उसने गाय का रूप धारण करके अपनी व्यथा निवेदित की। भगवान नारायण ने उन्हें देववाणी द्वारा गोकुल में अवतरित होने का वचन दिया।

भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का एक मुख्य प्रयोजन गोरक्षा भी था। यही कारण है कि लीलास्थली गोकुल चुनी गई। सहस्रों-सहस्र गौओं का पालन एवं रक्षण करने वाले नन्द के यहां आनंदघन श्रीकृष्ण बालरूप में लीला करने लगे। साथ में लिया हलधर श्री बलराम जी को क्योंकि कृषि का गोवंश से अभिन्न संबंध है। मुरलीधर-हलधर की यह जोड़ी मनुष्य को यह संदेश देने आई कि गोपालन के बिना कृषि संभव नहीं है और इन दोनों के बिना पृथ्वी पर जीवन भी संभव नहीं है। सृष्टि यज्ञ के प्रवर्तन के लिए अन्न और घृत दोनों चाहिए। यज्ञ से देवशक्तियां (प्रकृति पुष्ट) होती हैं और अन्नादि से जीव। दोनों का आधार है, गोपालन। अवतार होते ही लीलाकार्य प्रारम्भ हो गया। सबसे पहले दूध में विष मिलाकर बालकों की हत्या करने वाली पूतना वृत्ति का अंत किया गया।

लोभवृत्ति कंस से प्रेरित पूतना (मिलावट) सर्वत्र शिशुओं की हत्या में संलग्न थी। भगवान ने सबसे पहले उसे ही शुद्ध किया। फिर बारी थी उन वाहनों की जिनमें बालकों के हिस्से का दूध घी भरकर कंस को भेजा जाता था। शकटासुर को बालक श्रीकृष्ण ने स्पर्श मात्र से ही तोड़ दिया मानो कह रहे हों कि इस दूध घृत पर लोभी कंस का नहीं ग्वालबालों का अधिकार है। दूध में पानी मिलाने वाले (बकासुर), स्वादिष्ट फलदार वृक्षों से मनुष्यों को वंचित करने वाले धेनुकासुर, नकली गायों का रूप धरे (जर्सी गायों का प्रतीक) वत्सासुर इत्यादि दूषणों को बाल अवस्था के खेल ही खेल में शुद्ध करके श्रीकृष्ण बलराम ने एक क्रान्तिकारी आंदोलन शुरू कर दिया।

जब श्रीकृष्ण ने देखा कि दुग्धादि का उत्पादन करने वाले गोपालक पर कर लगाकर उसे दूध से वंचित किया जा रहा है तब उन्होंने दो विचित्र लीलायें प्रारम्भ की। माखन चोरी और मटकी फोड़ना। गोपांगनाओं के घरों में टोली बनाकर घुस जाते और उनका एकत्रित माखन ग्वाल बालों में बांट देते। जो गोपियां दूध, दही भरे मटके सिर पर रखकर मथुरा की ओर जाती उनकी मटकियां फोड़ दी जाती। ग्वाल बालों के इस संगठन ने अपने नेता श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुरूप यह अनूठी विरोध प्रदर्शन की युक्ति निकाली। उनके उपद्रवों से त्रस्त होकर गोपियां मथुरा का रास्ता ही भूल गयी।

श्रीकृष्ण के गोरक्षा अभियान का अंतिम और महत्वपूर्ण कार्य था रूढ़िवादी परम्पराओं पर प्रहार कर स्वस्थ परम्परा का प्रचलन करना। गोपजनों के मन में यह धारणा थी कि कि सृष्टि में वृष्टि किसी देवता के अधीन है। वह जब चाहे वर्षा करना न चाहे तो वृष्टि न हों। श्रीकृष्ण गोपजनों को समझाना चाहते थे कि वृष्टि यज्ञ से होती है। यज्ञ का आधार गौएं हैं। वे ही कृषि का भी आधार हैं वृष्टि से प्रकृति पुष्ट होती है। यह गोवसंर्द्धन, पर ही आधारित है। अतः यदि पूजा करना ही है तो गौओं और गौओं के विचारण स्थल, आश्रय स्थल गोवर्धन की पूजा करो। भोले-भाले ग्वालों के मन में श्रद्धा का संचार करने के लिए श्रीकृष्ण ने स्वयं गोवर्धन के रूप में प्रकट होेकर उनकी पूजा स्वीकार की और इस प्रकार प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा और गोवंश की महत्ता स्थापित की। सुंदर-सुंदर स्वर्णाभूषणों से गौओं को सजाया गया, बहुत मात्रा में हरा घास, तृण व पकवान बनाकर गौओं को खिलाया और उनकी विधिवत पूजा की। इस प्रकार गोवर्धन पूजा द्वारा गोवंश की पूजा करने का श्रीगणेश हुआ।

गोपालों की इस नई प्रणाली से इन्द्र के अहंकार को चोट लगी। वह सर्प की तरह फुफकारता हुआ अपने प्रलयकालीन मेघों को लेकर ब्रज पर टूट पड़ा। घनघोर वर्षा होने लगी। इन्द्र चाहता था कि गोवंश और गोवर्धन पर्वत को बहा दूंगा। सभी गौएं और ग्वाल श्रीकृष्ण की शरण में गये। श्रीकृष्ण ने खेल ही खेल में गोवर्धन को धारण करके उसके नीचे समस्त ब्रजवासियों को आश्रय प्रदान किया। इस लीला द्वारा भगवान श्रीकृष्ण ने यह समझाया कि प्रकृति के कोप से रक्षा करने वाले वृक्ष व पर्वत ही हैं।

अतिवृष्टि हो या अनावृष्टि दोनों का संतुलन वृक्ष वनस्पति एवं गौओं पर आधारित है। इस प्रकार इन्द्र के अभिमान को नष्ट करके श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों की रक्षा की। लज्जित होकर इंद्र ने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण की। गोवंश की प्रथम माता सुरभि को आगे करके इन्द्र ने श्रीकृष्ण की स्तुति की और सुरभि के दूध की धारा से भगवान का अभिषेक किया। गोवंश के रक्षक एवं प्राणदाता होने के कारण इस लीला के बाद श्रीकृष्ण का ‘गोविन्द’ नाम हुआ। बोलिये गोविन्द गोपाल की जय।