एक संत का उपदेशामृत

धन, सम्पत्ति परिवार को छोड़कर वन में रहने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यक है लोभ, मोह, मान, काम, क्रोध का त्याग और यह तभी होता है, जब साधक विनाशी के परे अविनाशी को जान लेता है। नित्य एक रस रहने वाली आत्मा को जान लेता है। वाणी के मौन से शक्ति बढ़ती है। मन के मौन से अन्तर्दृष्टि खुलती है। बुद्धि के मौन से स्व के सत्य तत्व की अनुभूति होती है।

निष्काम होकर कर्तव्य पालन से अथवा सेवा करते रहने से अन्तः करण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्ध होने से तत्व ज्ञान होता है। तत्व ज्ञान होने पर प्रज्ञा स्थिर होती है। प्रज्ञा के स्थिर होने पर ही परमानंद का निरंतर बोध होता है।

जो कुछ अनेक है वही संसार हैं, इच्छायें, वासनायें, विचार, कल्प तथा दृश्य अनेक हैं। ये ही संसार की परिधि में हैं। विवेक, चैतन्य, ज्ञान, प्रेम एक है। वहीं एक मैं हूं के स्वरूप में विद्यमान है। अनेकता की लोल लहरों के नीचे एकता का शांति मय धरातल है। प्रभु के समक्ष केवल अपने मैं को समर्पित करना होता है और संसार के समक्ष जो कुछ प्रभु से मिला है, उसे अर्पित करना होता है। अपने मैं को समर्पित करने का साहस कर सको तो अपने मैं के स्थान पर पूर्ण प्रभु को पा जाओगे। मनुष्य का शरीर एक दीपक की भांति है और चेतना में जलती हुई लौ की भांति है। मिट्टी के दीपक में ध्यान रहा तो जीवन व्यर्थ है। दीपक की ज्योति में अनंत प्रभु के दर्शन होते हैं।

जब मन में व्यर्थ संकल्प विकल्प एवं व्यर्थ विचार उठते हों तब प्रभु के प्रिय नाम अथवा अपने इष्ट मंत्र का अधिक से अधिक जप करना चाहिये। फिर व्यर्थ संकल्प एवं व्यर्थ विचार अपने आप शांत हो जाते हैं। और अंतःकरण में प्रियतम प्रभु का प्रसाद प्राप्त होता है। मूढ़ता दूर होने पर मैं के स्थान पर तू ही तू और मेरा के स्थान पर तेरा ही तेरा दिखने लगता है। अपने भीतर प्रभु सबंधित भावों विचारों को भरे रहो। मन को खाली न रखो। खाली रखने पर संसार का प्रपंच घुस जायेगा। जितनी बुराईयां होती हैं वे सूने पन में हो जाती है, इसलिये बुराईयों से बचना है तो मन में पवित्र भाव भरे रहो। सुसंगति में घिरे रहो, सदा शुभ कर्म में लगे रहो, अवकास मिलते ही प्रभु के ध्यान में स्व के अध्ययन में नाम स्मरण में जप में समय सार्थक करो। व्यर्थ में ही अनर्थ होता है।

संसार में प्रिय सम्बन्धियों के संयोग में इन्द्रियों के विशय भोग में धन अधिकार में सुख मानने वालों सावधान होकर समझ लो। तुम्हारे सुख का अंत दुःख में होगा क्योंकि जो कुछ तुम्हें मिला है वह किसी समय अवश्य ही छूट जायेगा। जिसे हम नहीं जानते वही अपना सर्वस्व है क्योंकि वह हमें जानता है। हमें विश्वास रखना चाहिये कि अपना परमाश्रय एक मात्र वही अकारण करूणामय प्रभु ही है और वह हमारी प्रत्येक चेष्ठा के प्रत्येक भाव के तथा प्रत्येक विचार के साथ ही वह हमारे विचारों, भावनाओं, चेष्टाओं के मध्य में ही विद्यमान है। इसका अनुभव हम पूर्ण मौन शांत शून्य होकर ही कर सकते हैं। अशुभ संकल्पों का त्याग करो। शुभ संकल्प प्रभु की कृपा से पूर्ण होंगे।

वे संकल्प अशुभ हैं जिनकी पूर्ति के साधन सुलभ नहीं हैं। अर्थात् जिनकी पूर्ति किसी व्यक्ति की पूर्ति किसी व्यक्ति की सहायता पराधीनता पूर्वक होती हैं, दूसरों की सेवा करना, दान करना, तीर्थ यात्रा करना, संतों का संग करना तथा एकांत सेवन करना शुभ है। स्वयं ही तीर्थ स्वरूप होकर अपने संग से दूसरों को पवित्र बनाने की प्रेरणा लेने दो। शांत बैठ जाओ। शरीर से शांत बैठने पर शरीर के भीतर जो कुछ स्वतः होता है। तटस्थ होकर देखो, कोई निर्णय आग्रह निग्रह न करो। बस देखते रहो। इस निरीक्षण से चेतन द्वारा अचेतन में प्रवेश होता है। देख कर घबरा न जाना, बाहर की ओर न भागना, निरीक्षण मात्र करते रहना। यहां शांति एवं धैर्य की परीक्षा देनी होगी। इस अचेतन स्तर से ही कामना एवं वासना से मुक्ति का द्वार मिल सकता है।

परमात्मा तुम्हारी सभी दशाओं में विद्यमान है। भोग में, रोग में, आधि व्याधि में, जहां तुम हो वहीं वह छिपा है। इसी प्रकार तुम जब उसे पुकारते हो तब वह तुम्हारी पुकार के बीच में ही है। अब उसे खोजते हो। तब खोज के साथ मिला है। जब उसके लिये व्याकुल होते हो तब व्याकुल के मध्य में ही वह है। जब तुम कहीं होते हो कुछ नहीं बनते हो, कुछ नहीं चाहते हो, सर्वथा शांत एवं अंतर्मुख हो जाते हो तब वह तुम्हारे समक्ष परमात्मा तुम्हारी सभी दशाओं में विद्यमान है। भोग में, रोग में, आधि व्याधि में, जहां तुम हो वहीं वह छिपा है।

इसी प्रकार तुम जब उसे पुकारते हो तब वह तुम्हारी पुकार के बीच में ही है। अब उसे खोजते हो। तब खोज के साथ मिला है। जब उसके लिये व्याकुल होते हो तब व्याकुल के मध्य में ही वह है। जब तुम कहीं होते हो कुछ नहीं बनते हो, कुछ नहीं चाहते हो, सर्वथा शांत एवं अंतर्मुख हो जाते हो तब वह तुम्हारे समक्ष हो जाता है। जब अपने आप में पूर्ण प्रेम रूप में नित्य प्राप्त प्रभु अनुभव में आते रहे हैं तभी भक्ति की पूर्णता होती है। नित्य प्राप्त का दर्शन ही ज्ञान है। नित्य प्राप्त से निरंतर मिलन ही भक्ति है।