राम रसायन

नीरजा माधव (निखिल दुनिया ब्यूरो)।

सम्पूर्ण कलाओं से युक्त श्रीराम रूपी रसायन के प्रभाव से हनुमान केवल बल, ओज और शारीरिक क्षमता में ही सर्वश्रेष्ठ नहीं रहते, बल्कि मेधा में भी उनके बराबर कोई नहीं टिकता । लोग उनसे ‘बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहि’ की गुहार लगाते हैं। ‘बाल समय रवि भक्ष लियो’ के पीछे उनके भीतर पेट की भूख नहीं थी वरन् ज्ञान की भूख थी। एक बाल जिज्ञासा, सूर्य के बारे में जानने की। उसे पास से देखने की, अन्यथा माता अंजनि उनकी क्षुधा घर में शान्त कर सकती थी ।

सामान्यतया उत्तम रस आदि धतुओं को प्राप्त करने का उपाय रसायन कहलाता है। यह भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्धति का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। शास्त्रों ने रसायन को उस तत्व के रूप में परिभाषित किया है जिसके प्रयोग से जरा और व्याधियों को दूर किया जा सके। आयुर्वेद के अनेक ग्रन्थों में इसका विशद विवेचन मिलता है। चरक संहिता में रसायन के गुण बताते हुए कहा गया है कि रसायन भेषज का सेवन करने से मनुष्य दीर्घ आयु, स्मरण शक्ति, धरणा शक्ति, आरोग्य, तरुणावस्था, प्रभा, गौर अथवा कृष्ण, स्वर का उदार होना, देह एवं इन्द्रियों में उत्तम बल की प्राप्ति, वाक्सिद्धि, नम्रता आदि गुणों को प्राप्त करता है। इसी के साथ बताया गया है कि जब तक शरीर आन्तरिक रूप से शुद्ध नहीं हो जाता तब तक रसायन का कोई लाभ नहीं होता। इसीलिए वमन, विरेचन, आस्थापन आदि पंचकर्म से शुद्ध हो जाने और सभी प्रकार की व्याधियों से मुक्त हो जाने के बाद रसायन का प्रयोग करना चाहिए।

एक बार काशी मण्डल की वैद्य सभा में जब सुन्दर स्वास्थ्य में रसायन की चिकित्सा की उपादेयता विषय पर मुझे वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया और मैंने संकोवश स्वीकार भी कर लिया तब महसूस हुआ कि मुझ जैसे अतैराक को नदी सन्तरण के लिए भेज दिया गया है। लहरों के बहाव के साथ छोड़ दूं तो मेरी इस देह का शायद सीधे सागर के साथ साक्षात्कार हो। कैसा होगा वह दृश्य? सागर सन्तरण किसी से सम्भव हुआ होगा क्या? डूबने की ही नियति लेकर जाता होगा व्यक्ति उसके पास।

सागर सन्तरण की बात सोचते ही एक विद्युत कौंध सी हुई मेरे मन में। हमारे महावीर हनुमान ने समुद्र सन्तरण का इतिहास ही रचा है। ‘सुरसा वदन पैठि विस्तारा’ सबको पछाड़ते हुए समुद्र लांघ गए थे। उसी हनुमान की न जाने कितनी प्रार्थना की है गोस्वामी तुलसीदास ने। ‘बजरंग बाण’ में तो न जाने कितनी सौगन्ध ही दे डाली है हनुमान को उनके प्रिय भगवान श्रीराम और माता जानकी की। कैसी आकुलता के साथ हनुमान जी को तुलसी बाता टेरते हैं –
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल काल मारीमर।।
इन्हें ‘मारु’ तोहि शपथ राम की। राखु नाम मरजाद नाम की।।
जनक सुता हरिदास कहावो। ताकी शपथ, विलम्ब न लावो।।

हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करते हुए कई बार मन में यह प्रश्न कौंधता है कि तुलसीदास ने क्या किसी विशेष परिस्थिति में ‘बजरंग बाण’ और ‘हनुमान चालीसा’ की रचना की होगी, जिसमें उनके हृदय की व्याकुलता अैर्ध्य की सीमा तक पहुंच जाती है और वे हनुमान जी को अपना कार्य सिद्ध करने के लिए उनके प्रिय श्रीराम और माता जानकी तक की सौगन्ध तक दे डालते हैं? तुलसीदास की अन्य रचनाओं में ऐसी उग्रता और आकुलता के दर्शन तो पाठकों को नहीं होते। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाई पड़ती है-

तुलसीदास की लोकप्रियता और सिद्धि के बारे में जन चर्चा सुनकर तत्कालीन मुगल बादशाह ने उन्हें अपने दरबार में बुलवाया और कुछ चमत्कार दिखाने को कहा। तुलसी बाबा ठहरे राम नाम के साधक। विनम्रतापूर्व मना किया। भइया, कहां फसाय रह्यो हौ। मैं कोई चमत्कारी बाबा नहीं। मैं तो बस राम भक्ति में डूबा उनका एक अदना सा दास हूं। बादशाह ने रुष्ट होकर उन्हें बन्दीगृह में डलवा दिया। सोचा, अधिक कमाई-बमाई के चक्कर में यह बाबा ना-नुकुर कर रहा होगा। कुछ दिन बन्दीगृह की हवा खा लेगा तो सम्भवतः रहस्य उगल दे। बन्दीगृह में तुलसीदास जी की भक्ति चर्चा बाधित हुई तो उनके भीतर का तेज और तपोबल उग्र हो उठा। उन्होंने वहीं पर हनुमान जी की आराधना की और उन्हें राम जानकी की सौगन्ध देते हुए इस कष्ट निवारण के लिए बजरंग बाण की रचना की।

कहते हैं, उसी के बाद बादशाह के राज्य में बन्दरों की सेना का ऐसा आतंक बढ़ा कि हार कर उसे न केवल तुलसी बाबा को ससम्मान बाहर करना पड़ा बल्कि अपनी राजधनी भी बदलनी पड़ी। इतना तक कहा जाता है कि उसी के बाद से उस बादशाह का हृदय परिवर्तन भी हुआ। सनातन धर्म में उनकी रूचि बढ़ी और अपनी धर्मिक उदारता के कारण वह विश्व प्रसिद्ध हुआ। आज तक उसकी पुरानी राजधानी में बन्दरों की बहुतायत देखी जा सकती है।

हो सकता है वक्र पन्थियों को यह कपोल-कल्पना लगे परन्तु  पर तुलसी बाबा के बहाने रसायन विषय में कुछ सोचने के लिए सामग्री तो मिल ही गई। डूबते को तिनके का सहारा। हनुमान चालीसा में तुलसी बाबा ने लिखा है-‘राम रसायन तुम्हारे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।’ अर्थात् हे हनुमान, आप निरन्तर श्रीराम की शरण में रहते हैं, और आपके पास असाध्य रोगों एवं वृद्धावस्था के नाश के लिए राम रूपी रसायन औषधि है। मैं चौंकी। सचमुच राम रूपी औषधी के कारण ही हनुमान महावीर, पराक्रमी, अष्ट सिद्धियों से युक्त आकाश गमन और समुद्र सन्तरण की क्षमता रखते हैं। राम नाम ही उनका सिद्ध मकरध्वज है, शिलाजीत है, अमृतत्व है।

मुझे आधार मिला था। आध्ुनिक युग का एक विज्ञान भी रसायन यानी कैमेस्ट्री है। इस शब्द की उत्पत्ति इजिप्ट देश के एक प्राचीन नाम कीमिया से हुई है। कीमिया का शाब्दिक अर्थ है श्याम वर्ण। सम्भवतः इजिप्ट देश की मिट्टी का वर्ण काला होने के कारण उसका नाम कीमिया पड़ा होगा, और कैमेस्ट्री शब्द वहां की कला के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इसमें सन्देह नहीं कि प्राचीन काल में रसायन का उदय एक कला के रूप में ही हुआ था परन्तु कालान्तर में यह विज्ञान से जुड़ता चला गया।

सम्पूर्ण कलाओं से युक्त श्रीराम रूपी रसायन के प्रभाव से हनुमान केवल बल, ओज और शारीरिक क्षमता में ही सर्वश्रेष्ठ नहीं रहते, बल्कि मेध में भी उनके बराबर कोई नहीं टिकता। ‘ज्ञानिनामग्रगण्यं’ हनुमान अनेक स्थानों पर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हैं। लोग उनसे ‘बल, बुद्धि विद्या देहु मोहि’ की गुहार लगाते हैं क्योंकि वे सर्वशक्तिमान हैं। ‘बाल समय रवि भक्ष लियो’ के पीछे उनके भीतर पेट की भूख नहीं थी वरन् ज्ञान की भूख थी। एक बाल जिज्ञासा, सूर्य के बारे में जानने की। उसे पास से देखने की, अन्यथा माता अंजनि उनकी क्षुधा घर में शान्त कर सकती थी। परन्तु यहां तो प्रखर मेधावाला बालक हनुमान सूर्य के विज्ञान को जानने की भूख लिए हुए है। इस ज्ञान की भूख लिए वह सूर्य को निगलते हैं, यानी उस विज्ञान को आत्मसात करते हैं और कालजयी तेजप्रताप महाजगवन्दन बन जाते हैं। कहीं भी उस सूर्य रूपी लड्डू को पकड़ने से उनके जल जाने या झुलस जाने की कथा नहीं प्राप्त होती। इसी प्रकार समुद्र सन्तरण करने की अद्भुत क्षमता भी हनुमान के पास ही मिलती है। सम्भवतः परवर्ती काल में समुद्र पार जाने की वर्जना के पीछे प्रतिभा पलायन को रोकने का सामाजिक दबाव ही रहा होगा परन्तु राम रसायन के चमत्कारी प्रभाव से हनुमान तो समुद्र सन्तरण का इतिहास रचते हैं और सोने की लंका को तहस-नहस कर पुनः वापस आ जाते हैं। स्वर्ण नगर का चाकचिक्य उन्हें बांध् नहीं पाता। वे अपनी जड़ों की ओर लौट आते हैं, अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में लौट आते हैं। सभी को वहीं लौटना पड़ता है। माया बहुत देर तक शुद्ध आत्मा को अपने आकर्षण में नहीं बांध पाती। यह राम रसायन की महत्ता ही है कि हनुमान संजीवनी सहित पहाड़ उखाड़ लेते हैं, अपनी एक हथेली पर उसे संभाले और दूसरे हाथ को एक निश्चित मुद्रा में आगे की ओर पफैलाए आकाश मार्ग से उड़ते हैं। इस अद्भुत क्षमता के साथ ही वे वेद विशारद भी हैं, यानी हमारी संस्कृति की सनातनता के ज्ञाता भी हैं।
मैं इस रसायन की महत्ता पर विचार कर रही थी। बाह्य सौन्दर्य को आभ्यन्तर सौन्दर्य की ओर मोड़ने के लिए शरीर का रोग मुक्त और सुन्दर भी होना आवश्यक तत्त्व है। सुन्दर यानी भीतर उस असीम सौन्दर्य बीज महसूस करना। अन्तर स्पष्ट है-आभ्यन्तर आनन्द की प्राप्ति के लिए ऐन्द्रिक सुख आवश्यक नहीं बल्कि आरोग्यता आवश्यक तत्त्व है क्योंकि यही देह परमानन्द का साध्न है। सम्भवतः इसीलिए सनातन र्ध्म के अनेक बाह्य अनुष्ठान और कर्मकाण्ड सीध्े मानव स्वास्थ्य के विज्ञान से भी जुड़े हैं। आसन से लेकर प्राणायाम तक, न्यास से लेकर विनियोग तक, योग से लेकर ध्यान तक, सभी हमारे बाह्य और आभ्यन्तर संरचना को ऊर्जा प्रदान करते हैं और इस प्रकार सत्, चित्, परमानन्द ईश्वर की ओर उन्मुख भी करते हैं। इस प्रेयस् और श्रेयस् की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है राम रूपी रसायन। भौतिक संसाध्नों और ऐश्वर्य के बदले इस रसायन की एक बूंद भी प्राप्त नहीं हो सकती।
भौतिक सुखों के बीच भी अपनी अपर्याप्तता का बोध पश्चिमी जगत् को हुआ तो उन्हें भारत की सुधि आई। गंगा घाटों से लेकर रामेश्वरम् तक की धूलि अपने माथे पर ध्रने के लिए वे दौड़ लगाने लगे। शान्ति की खोज में मठों और आश्रमों में शरण लेने लगे। छाप-तिलक और रामनामी का मर्म समझे बिना उसे माथे और कांधे पर सजाने लगे। धर्म की भीतरी धरा को स्पर्श किए बिना भी ऊपरी सतह से ही अंजुरी भरकर अपने ऊपर उलीचने लगे। जहां सारे देवगण रमण करते हैं उस राम नाम की माला जपने लगे। होटलों में शाकाहारी व्यंजन का आर्डर देने लगे। उनके धर्म गुरुओं को चिन्ता सताने लगी, यह तो हिन्दू प्रभाव बढ़ रहा है, जैन प्रभाव बढ़ रहा है।, परन्तु वे भूल जाते हैं कि वटवृक्ष का अस्तित्व है तो उसकी छाया भी दूर तक तो पड़ेगी ही। कुछ लोग इस वटवृक्ष की जड़ों को ही काट डालना चाहते हैं। कुल्हाड़ी थामे उनके हाथ उच्छेदवादी सिद्धांत के कर्त्ता, कर्म, सम्प्रदान और अन्ततः अपादान बन जाते हैं। वटवृक्ष की हर शाखा धरती को चूम चूम मूल से सह-सम्बन्ध स्थापित करती जाती है और ये तत्पुरुष उसके मूल को ढूंढ़ने में ही हांपफ जाते हैं। भैरव-वाहन की थकान बन जाते हैं। अपनी ही चीजों को देख देख गले से गुर्राहट जैसी आवाज निकालने लगते हैं। कभी आगे की ओर झपटते हैं तो कभी पीछे ;अतीतद्ध को नोचकर अलग कर देना चाहते हैं। ऐसे आत्मनोचू लोगों को असली भारत की पहचना कहां? कोई दूसरा आकर उसे पहचानता है तो वे भी पीछे-पीछे लग लेते हैं। सुखद है कि ऐसी वक्री और छाया पर गुर्राने वाले लोगों की संख्या मुट्ठी भर से ज्यादा किसी काल में न हो सकी।
चर्चा राम रसायन से सरकती हुई महावीर और पिफर कलयुगी भैरव-वाहनों तक जा पहुंची तो अकस्मात् नहीं है। चिकित्सा विज्ञान के जनक भगवान् धन्वन्तरि की जयन्ती जैसे सोने चांदी से सरकती हुई तांबे और स्टील के बर्तनों की खरीद फरोक्त तक आकर रुक गई, उसी तरह विचारों की श्रृंखला कौन-कौन से ओर छोर छू आएगी, कोई पहले से नहीं जानता। मैं भी नहीं जानती। यह भी अकस्मात् नहीं है कि ध्न्वन्तरि जयन्ती हनुमान जयन्ती से ठीक एक दिन पूर्व मनाई जाती है और हनुमान जयन्ती भी प्रकाश पर्व दीपावली से एक दिन पूर्व पड़ती है। प्रकाश यानी ऊर्जा। यह प्रकाश पर्व शरद ट्टतु की पूर्णता का प्रतीक है, ऊर्जा से लबालब भरे हम दीपकों की झिलमिलाती पंक्ति द्वारा सम्बन्ध् तलाशते हैं उस अक्षय ऊर्जा स्त्रोत से इसीलिए शरद ट्टतु को शक्ति संचय की ऋतु भी कहते हैं। आयुर्वेद की मान्यता है कि जब शरीर में आध्यिं व्याध्यिं न हों तब रसायन का उपयोग करने से हमारे भीतर सभी गुणों, जैसे धरणा, वाग्मिता, दीर्घ आयु, स्वर की उदारता, स्मरण शक्ति आदि को धरण करने की क्षमता आ पाती है। कालचक्र में शरद ट्टतु बार बार आकर मनुष्य को चेता जाती है कि शक्ति संचय कर लो। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति संभव नहीं है, और शिव-शक्ति दोनों की कृपा प्राप्त करने के लिए राम-रसायन से बढ़कर दूसरी कोई औषधि् नहीं है, यानी रसायन के रूप में एक ऐसा अक्षय स्त्रोत जो जीवन से लेकर उस धरा धम को छोड़ने तक हमारा काम्य होता है।
एक प्रचलित और बहुश्रुत घटना याद आती है। रामनगर की रामलीला विश्व प्रसिद्ध है। उसमें प्राचीनकाल से ही काशी नरेश की उपस्थिति आवश्यक रूप से होती रही है। एक बार रामलीला के अनुष यज्ञ वाले दिन नन्हें राजकुमार को ज्वर हो गया। महाराज चिन्तित हो उठे। रामलीला वे स्वयं भी बहुत निष्ठा और श्रद्धा भाव के साथ देखने जाते थे। राजकुमार की ऐसी अवस्था। वे धर्म-संकट में पड़ गए। अन्त में राम नाम का स्मरण कर और उनकी कृपा पर राजकुमार को छोड़ वे रामलीला में उपस्थित हुए, पर बार बार राजकुमार के लिए चिन्ता उद्विग्नता बन उनके मुखमण्डल पर आ विराजती। रामलीला के व्यास ने लीला समाप्त होने पर महाराज से कारण पूछा तो उन्होंने अपनी चिन्ता बताई और जल्दी महल पहुंचने की इच्छा भी जताई। व्यास ने राम बने लीला के पात्रा के गले से पफूलों की माला उतारकर देते हुए कहा-यह माला राजकुमार को पहना दीजिएगा। प्रभु सब ठीक करेंगे। राजा ने वैसा ही किया और चमत्कारिक रूप से राजकुमार का ज्वर बिना किसी अन्य औषधि के कुछ ही देर में उतर गया।
अल्प बुद्धिजीवियों को यह प्रसंग मनगढ़न्त कहानी लग सकती है परन्तु आस्था एवं विश्वास से भरे हृदय के लिए यह उसी प्रकार सत्य है जैसे सूर्य और चन्द्रमा का दिखाई देना। आज के वैज्ञानिकों को भी मनुष्य के भीतर भरे, भय, प्रसन्नता और विश्वास के आधर पर अनेक अनुसन्धनों द्वारा किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में सपफलता मिली है। मनुष्य के अनेक मनोरोगों की जड़ में कई प्रकार के भावों की विकृति ही तो होती है, फिर उन भावों की मूल प्रकृति अथवा सुकृति निश्चय ही उसके विश्वास के साथ संघनित हो नये और सकारात्मक परिणाम देगी। प्रकृति में कुछ भी निरर्थक नहीं है। आदि स्त्रोत से ही सारी धराएं निःसृत हैं। विकास का उच्चतम सोपान भी उसी आदि स्त्रोत के लिए उद्दिष्ट है। राम मानव-विकास के उसी उच्चतम सोपान के उद्देश्य हैं। अभी तो हम आकाश गमन और समुद्र सन्तरण कर स्वर्ण नगरी के चाकचिक्य में ही उलझे हैं। वापस आने पर ही राम मिलेंगे, उनकी आत्मीयता मिलेगी ओर मिलेगी शान्ति की वह नगरी जो अयोध्या है, यानी जहां युद्ध नहीं होते, जहां केवल राम विराजते हैं, उनका नाम विराजता है, उनकी चरण पादुका का सुशासन होता है, और चारों ओर आनन्द ही आनन्द प्रसारित है।