पाप ही रोग बनकर मनुष्यों को देते हैं पीड़ा

प्रभु दत्त ब्रह्मचारी।
जब तक मैंने आयुर्वेद के ग्रन्थों का अध्ययन नहीं किया था, तब तक मैं यही समझता था कि उनमें रोगों का निदान तथा सोंठ, मिर्च, पीपल, हर्रा, बहेड़ा, आमलादि औषधियां ही लिखी होंगी। किंतु जब मैंने आर्ष आयुर्वेदिक ग्रन्थों का अध्ययन किया, तब मुझे पता चला कि यह तो मोक्ष मार्ग का शासन करने वाला, शिक्षा देने वाला शास्त्र है। इसका एक मात्र उद्देश्य रोगों से छुटकारा करना ही नहीं है, अपितु इसका मुख्य उद्देश्य तो मोक्ष प्राप्त करने का साधन बताना है।

शास्त्र का अर्थ ही है-(शिष्यते अनेन इति शास्त्रम्) जो हमें मोक्ष-मार्ग सिखाये। जैसे सांख्यशास्त्र कहता है, प्रकृति पुरूष के विवेक से मोक्ष होता है। योग शास्त्र कहता है, योग द्वारा समाधि प्राप्त करने से मोक्ष मिलता है। वेदान्त शास्त्र कहता है-ब्रह्मज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। उसी प्रकार आयुर्वेदशास्त्र कहता है-‘धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्’-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति में श्रेष्ठ मूल कारण शरीर का निरोग होना ही है।

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है, तभी ब्रह्म का चिन्तन सम्भव है। जैसे पैर में यदि कांटा गड़ जाए तो सब समय मन उसी में लगा रहता है। वह ब्रह्म-चिन्तन कैसे करेगा? चरक ने दार्शनिक ढंग से प्रकृति-पुरुष का विचार किया है और प्रायः वे सांख्य-शास्त्र के ही सिद्धान्त के पोषक हैं। हमारे यहां रोगों का नाश केवल विषयों के भोग के लिए नहीं है। विषयों का भली-भांति भोग भी स्वस्थ पुरूष ही कर सकता है। आयुर्वेद तो स्वास्थ्य लाभ इसीलिए कराना चाहता है, जिससे हम भली भांति मोक्ष मार्ग का चिन्तन कर सकें। इसके लिए सबसे पहले शरीर स्वस्थ होना चाहिए। स्वस्थ शरीर होने पर ही अन्तःकरण विशुद्ध बन सकता है। यह शरीर व्याधि का घर है-शरीरं व्याधिमन्दिरम्।

व्याधि होती है पूर्व जन्मों के पापों के कारण-‘पूर्वजन्मकृतं पापं व्याधि रूपेण बाधते।’ पूर्व जन्म के पाप ही रोग बनकर मनुष्यों को पीड़ा देते हैं। जो ब्रह्मवेत्ता ऋषिगण पापरहित-निषकल्मष होते थे, वे जरा, रोग तथा मृत्यु से रहित होते थे। रोगों के भेद शास्त्रों में रोग चार प्रकार के बताये गये हैं- 1-स्वाभाविक, 2-आगन्तुक, 3-मानसिक और 4-कायिक

स्वाभाविक रोग वे कहलाते हैं, जो शरीर में स्वभाव से ही होते हैं, जैसे प्यास, भूख भी एक प्रकार के रोग ही हैं। शरीर धारियों को भूख, प्यास, निद्रा, जागना, मृत्यु-ये स्वाभाविक होते हैं। इनकी औषधि भी हैं। भूख की औषिध भोजन है, प्यास की औषधि पानी या पेय पदार्थ है, निद्रा की औषधि सोना है और मृत्यु की कोई औषधि नहीं है। एक स्वाभाविक रोग और है, जैसे कोई जन्म से ही अन्धा उत्पन्न होता है, ये सब स्वाभाविक रोगों के अन्तर्गत आते हैं।

दूसरे हैं आगन्तुक रोग, जैसे किसी बैल ने सींग मार दिया, किसी पशु ने लात मार दी, किसी विषैले कीड़े ने काट लिया अथवा किसी रोग से आंख फूट गयी या किसी बाहरी कारण से अंग-भंग हो गया, ये सब आगन्तुक रोग हैं। तीसरा है मानसिक रोग, जो मन के द्वारा शरीर को क्लेश देता है। जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, भय, अहंकार, दीनता, पिशुनता, विवाद तथा इसी प्रकार मन में उठने वाले अन्य विकार-ये सब मानसिक रोग ही हैं। कोई-कोई उन्माद, अपस्मार, मूर्च्छा, भ्रम और तम आदि रोगों की गणना भी मानसिक रोगों में ही करते हैं।

चौथे नम्बर पर कायिक रोग वह हैं जो त्रिदोषों के न्यूनाधिक से होता है, जैसे ज्वर पाण्डुरोग आदि-आदि। आप यथेच्छार करेंगे, मिथ्या आहार-विहार करेंगे तो धातुओं में विषमता आ जायेगी। आमाशय में दोष एकत्रित हो जाएंगे, वे अनेक रोगों को उत्पन्न करेंगे और आपकी अकाल-मृत्यु हो जायगी। रसायन के सेवन से बृहद् विवर मुख से लेकर गुदा तक विशुद्ध बन जाएगा, इससे आप पूरी आयु सौ वर्ष तक जीवित रह सकेंगे। शरीर में जब वात, पित्तादि दोनों बढ़ जाते हैं, तब स्नायुओं में नसों में मल भर जाता है, स्मृति नष्ट हो जाती है।

रसायन-सेवन से नाड़ियों की शुद्धि हो जाती है, इससे स्मृति-भ्रंश नहीं होता। वृद्धावस्था में, यहां तक कि मरणावस्था में भी स्मृति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। रसायन सेवन किस अवस्था में किया जाना चाहिए यह जानकारी होना भी जरूरी है। सात वर्ष की अवस्था के पश्चात् रसायन-सेवन से विशेष लाभ नहीं मिलता। कारण यह है कि वात-पित्तादि दोष अन्य धतु से मिलकर आंतों में अपना स्थायी घर बना लेते हैं। उन्हें गलाना कठिन हो जाता है। इसलिए रसायन-सेवन या तो युवावस्था के आरम्भ होने पर अथवा युवावस्था के मध्य में चालीस वर्ष की अवस्था में करना चाहिए। क्योंकि चालीस-पचास वर्ष के पश्चात् धतुओं का क्षय होना आरम्भ हो जाता है।

आयुर्वेदशास्त्र रसायन-सेवन अर्थात् औषधि-चिकित्सा पर विशेष बल देता है। आयुर्वेदशास्त्रा क्या है ? पहले आयु शब्द पर ही विचार करें। इस शरीर रूपी यन्त्र को सुचारूरूप से रखते हुए कौन संचालन करता है? उस शक्ति को प्राणशक्ति कहते हैं। इसीलिए उपनिषदों में प्राण को ब्रह्म कहा है। प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त हैं, शरीर के कर्णेन्द्रियादि तो सो भी जाते हैं, विश्राम कर लेते हैं, किन्तु यह प्राणशक्ति कभी भी न तो सोती है और न ही विश्राम करती है। रात-दिन अनवरत रूप में कार्य करती ही रहती है, चलती ही रहती है-‘चरैवेति-चरैवेति’ यही इसका मूल मन्त्रा है।

जब तक प्राण शक्ति चलती रहती है, तभी तक प्राणियों की आयु रहती है। जब यह इस शरीर में काम करना बंद कर देती है, तब आयु समाप्त हो जाती है। प्राण जब तक कार्य करते रहते हैं तभी तक जीवन है। प्राणी तभी तक जीवित कहलाता है, प्राणशक्ति के कार्य बंद कर करने पर वह मृतक कहलाने लगता है। इसलिए आयु को प्राण शक्ति को जो यथावत् रखने का ज्ञान कराये वही आयुर्वेद है। शरीर में प्राण ही तो सब कुछ है, प्राण ही शरीर की रक्षा करता है, उसे आधि-व्याधियों से बचाये रखने का प्रयत्न करता है।

प्राणों को स्वस्थ कैसे रखा जाय, इसी की शिक्षा आयुर्वेद देता है। प्राणों का हरण करने वाले, उन्हें क्षति पहुंचाने वाले रोग हैं। रोगों की उत्पत्ति राग से, अश्रुओं से, शोक से हुई है। अतः रोग शोक को उत्पन्न करने वाले हैं। अन्तःकरण के शोक को आधि् कहते हैं, काया-देह के दुःख-शोक को व्याधि कहते हैं। आधि और व्याधि दोनों ही प्राणों को हानि पहुंचाने वाले हैं। अतः आयुर्वेद दोनों की चिकित्सा करके शरीर को स्वस्थ रखने का उपाय बताता है।