कभी सोचा है कि मानव रूप में धरती पर आए भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हुई?

जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ा है, भगवान ने खुद यहां कई रूपों में अवतरित होकर दुनिया का उद्धार किया है। संसार के कल्याण के लिए उन्होंने तमाम लीलाएं रचीं और लोगों को जीवन का गूढ़ पाठ पढ़ाया। जन्म लेने का मकसद पूरा होने के बाद हमारी ही तरह उन्होंने भी दुनिया को अलविदा कहा था। मनुष्य रूप में जन्म लेने के कारण ईश्वर को भी धरती से वापस जाना पड़ा।हम इसीलिए उन्हें पूजते हैं, क्योंकि उनके जीवन की हर घटना हमारे पूरे अस्तित्व को बदल सकती है। हम उनकी लीलाओं से बहुत कुछ सीख सकते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि अवतार रूप में संसार में आने वाले भगवान श्रीकृष्ण किस तरह यहां से वापस गए थे-

श्रीपराशरजी कहते हैं-संसार के उपकार के लिए बलरामजी सहित श्रीकृष्ण ने दैत्यों और दुष्ट राजाओं का वध किया। अंत में अर्जुन के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण ने अठारह अक्षौहिणी सेना को मारकर पृथिवी का भार उतारा। फिर ब्राह्मणों के शाप से अपने कुल का भी उपसंहार किया।

श्रीमैत्रेय जी पूछे-मुने! श्रीजनार्दन ने विप्र शाप से किस प्रकार अपने कुल का नाश किया? श्रीपराशरजी ने कहा-एक बार कृष्ण के पुत्र सांब को एक शरारत सूझी। स्त्री का वेश लेकर वह अपने दोस्तों के साथ ऋषि विश्वामित्र, दुर्वासा, वशिष्ठ और नारद से मिलने गया। वे सभी भगवान् श्रीकृष्ण के साथ एक औपचारिक बैठक में शामिल होने के लिए द्वारका आए थे। तब यौवन से उन्मत्त हुए उन बालकों ने उन मुनीश्वरों को प्रणाम करन के अनन्तर अति नम्रता से पूछा-‘इस स्त्री को पुत्र की इच्छा है, मुनिजन! यह क्या जनेगी?’

यदुकुमारों के इस प्रकार धोखा देने पर उन दिव्य ज्ञान सम्पन्न मुनिजनों ने कुपित होकर कहा-‘यह एक मूसल जनेगी, जो समस्त यादवों के नाश का कारण होगा।’ मुनिगण के इस प्रकार कहने पर उन कुमारों ने सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों का त्यों राजा उग्रसेन से कह दिया तथा साम्ब के पेट से एक मूसल उत्पन्न हुआ। उग्रसेन ने उस लोहमय मूसल का चूर्ण करा डाला और उसे उन बालकों ने समुद्र में फेंक दिया। उससे वहां बहुत से एरक (सरकंडे) उत्पन्न हो गये। यादवों द्वारा चूर्ण किये गये इस मूसल का एक खण्ड चूर्ण करने से बचा, उसे भी समुद्र में ही फेंकवा दिया। उसे एक मछली निगल गयी। उसी मछली को मछेरों ने पकड़ लिया। उसके चीरने पर उस मूसलखण्ड को जरा नामक व्याध ने ले लिया।

उस समय भगवान् ने देखा कि द्वारकापुरी में रात-दिन नाश के सूचक महान् उत्पात हो रहे हैं। उन उत्पातों को देखकर भगवान् ने यादवों से कहा-‘देखा ये कैसे घोर उपद्रव हो रहे हैं, चलो, शीघ्र ही इनकी शान्ति के लिए प्रभासक्षेत्र को चलें।’ श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर महाभागवत यादव श्रेष्ठ उद्धव ने श्रीहरि को प्रणाम करके कहा-‘भगवन्! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब आप इस कुल का नाश करेंगे, क्योंकि अच्युत! इस समय सब ओर इसके नाश के सूचक कारण दिखायी दे रहे हैं, अतः मुझे आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूूं?’

श्रीभगवान् बोले-उद्धव! अब तुम मेरी कृपा से प्राप्त हुई दिव्य गति से नर-नारायण के निवास स्थान हिमालय के गन्धमादन पर्वत पर जो पवित्र बदरिकाश्रम क्षेत्र है, वहां पर जाओ। पृथिवीतल पर वही सबसे पावन स्थान है। वहां पर मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से परम सिद्धि प्राप्त करोगे। भगवान् के ऐसा कहने पर उद्धवजी उन्हें प्रणाम कर तुरंत ही उनके बतलाये हुए तपोवन नर-नारायण के स्थान को चले गये। द्विज! तदनन्तर श्रीकृष्ण और बलराम आदि के सहित सम्पूर्ण यादव शीघ्रगामी रथों पर चढ़कर प्रभास क्षेत्र में आये। वहां पहुचंकर कुकुर, अन्धक ओर वृष्णि आदि वंशवाले समस्त यादवों के भोजन करते समय परस्पर कुछ विवाद हो जाने पर वहां कुवाक्यरूप ईंधन से युक्त प्रलयकारिणी कलहाग्नि धधक उठी।

श्रीमैत्रेयजी बोले-द्विज! अपना-अपना भोजन करते हुए उन यादवों में किस कारण से कलह अथवा संघर्ष हुआ? सो आप कहिये। श्रीपराशरजी बोले-‘मेरा भोजन शुद्ध है, तेरा अच्छा नहीं है, इस प्रकार भोजन के अच्छे-बुरे की चर्चा करते-करते उनमें परस्पर संघर्ष और कलह हो गया। तब वे दैवी प्रेरणा से विवश होकर आपस में क्रोध से रक्त नेत्र हुए एक दूसरे पर शस्त्र प्रहार करने लगे और जब शस्त्र समाप्त हो गये तो पास में ही उगे एक एरक (सरकंडे) ले लिये। उन वज्रतुल्य सरकंडों से ही वे उस दारुण युद्ध में एक दूसरे पर प्रहार करने लगे।

द्विज! प्रद्युम्न और साम्ब आदि कृष्णपुत्र गण, कृतवर्मा आदि तथा पृथु, विपृथु, चारुवर्मा, चारुक और अक्रूर आदि यादवगण एक दूसरे पर एरक रूपी वज्रों से प्रहार करने लगे। जब श्रीहरि ने उन्हें आपस में लड़ने से रोका तो उन्होंने अपने प्रतिपक्षी का सहायक होकर आये हुए समझा और उनकी बात की अवहेलना कर एक दूसरे को मारने लगे। श्रीकृष्णचन्द्र ने भी कुपित होकर उनका वध करने के लिए एक मुटठी सरकंडे उठा लिये। वे मुटठीभर सरकंडे लोहे के मूसलरूप हो गये।

उन मूसलरूप सरकंडों से श्रीकृष्णचन्द्र सम्पूर्ण आततायी यादवों को मारने के लगे तथा अन्य समस्त यादव भी वहां आ-आकर एक दूसरे को मारने लगे। द्विज! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र का जैत्र नामक रथ घोड़ों से आकृष्ट हो दारुक के देखते-देखते समुद्र के मध्यपथ से चला गया। इसके पश्चात् भगवान् के शंख,चक्र, गदा, तरकस और खड्ग आदि आयुध श्रीहरि की प्रदक्षिणा कर सूर्यमार्ग से चले गये।

महामुने! यहां श्रीकृष्ण ओर उनके सारथि दारुक को छोड़कर और कोई यदुवंशी जीवित न बचा। उन दोनों ने वहां घूमते हुए देखा कि श्रीबलरामजी के मुख से एक बहुत बड़ा सर्प निकल रहा है। वह विशाल फणधारी सर्प उनके मुखसे निकलकर सिद्ध और नागों से पूजित हुआ समुद्र की ओर गया। उसी समय समुद्र अध्र्य लेकर उस (महासर्प) के सम्मुख उपस्थित हुआ और वह नागश्रेष्ठों से पूजित हो समुद्र में घुस गया। इस प्रकार बलरामजी का प्रयाण देखकर श्रीकृष्णचन्द्र ने दारुक से कहा-‘तुम यह सब वृतांत उग्रसेन और वसुदेवजी से जाकर कहो।
बलभद्रजी का निर्वाण, यादवों का क्षय और मैं भी योगस्थ होकर शरीर छोडूंगा-यह सब समाचार उन्हें जाकर सुनाओ।’

संपूर्ण द्वारकावासी ओर उग्रसेन से कहना कि अब यह सम्पूर्ण द्वारका नगरी डूब जाएगी। इसलिए आप सब केवल अर्जुन के आगमन की प्रतीक्षा और करें। अर्जुन के यहां लौटते ही फिर कोई भी व्यक्ति द्वारका में न रहे। जहां वे कुरुनन्दन जायें वहीं सब लोग चले जायें। कुंतीपुत्र अर्जुन से तम मेरी ओर से कहना कि ‘अपनी सामथ्र्यनुसार तुम मेरे परिवार के लोगों की रक्षा करना’। द्वारुक तुम द्वारकावासी सभी लोगों को लेकर अर्जुन के साथ चले जाना। हमारे पीछे वज्र यदुवंश का राजा होगा।

श्रीपराशरजी कहते हैं– भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के इस प्रकार कहने पर दारुक ने उन्हें बारंबार प्रणाम किया और उनकी अनेक परिक्रमाएं कर उनके कथनानुसार चला गया। उस महाबुद्धि ने द्वारका में पहुंचकर संपूर्ण वृत्तांत सुना दिया। इधर भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त भूतों में व्याप्त वासुदेवस्वरूप परब्रह्म को अपनी आत्मा में आरोपित कर उनका ध्यान किया तथा महाभाग! वे पुरुषोतम लीला से ही अपने चित्त को गुणातीत परमात्मा में लीनकर तुरीयपद में स्थित हुए जानुओं पर चरण रखकर योगयुक्त होकर बैठें। इसी समय, जिसने मूसल के बचे हुए लोहखण्ड को अपने बाणी की नोंक पर लगा लिया था, वह जरा नामक व्याध वहां आया।

द्विजोत्तम! उस चरण को मृगाकार देखकर उस व्याध ने उसे दूर से ही खड़े-खड़े उसी लोह खण्ड वाले बाण से बींध डाला, किंतु वहां पहुंचने पर उसने एक चतुर्भुजधारी पुरूष देखा। यह देखते ही वह चरणों में गिरकर बारंबार उनसे कहने लगा-‘प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। मैंने बिना जाने ही मृग की आशंका से यह अपराध किया है, कृपया क्षमा कीजिये। मैं अपने पाप से दग्ध हो रहा हूं। आप मेरी रक्षा कीजिए। तब भगवान् ने उससे कहा-‘लुब्धक! तू तनिक भी न डर। मेरी कृपा से तू अभी देवताओं के स्थान स्वर्गलोक को चला जा।’ इन भगवद् वाक्यों के समाप्त होते ही वहां एक विमान आया, उस पर चढ़कर वह व्याध भगवान् की कृपा से उसी समय स्वर्ग को चला गया। उसके चले जाने पर भगवान् श्रीकृष्णचंद्र ने अपने आत्मा को अव्यय, अचिन्त्य, वासुदेव स्वरूप, अमल, अजन्मा, अमर, अप्रमेय, अखिलात्मा और ब्रह्मस्वरूप विष्णु भगवान में लीनकर त्रिगुणात्मक गति को पारकर इस मनुष्य शरीर को छोड़ दिया।