चीनी एक सफेद जहर है, जो अनेक रोगों का कारण है. . .

चीनी सफेद जहर है जो आज हर भारतीय के घर में पाया जाता है। चीनी जितनी मीठी होती है सेहत की नजर से देखें तो ये उतनी ही कड़वी भी साबित होती है। वैज्ञानिक तकनीक के विकास के पूर्व कहीं भी शक्कर खाद्य पदार्थों में प्रयुक्त नहीं की जाती थी। चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंगे्रजों ने 1868 में लगायी थी। उसके पहले भारतवासी शुद्ध देसी गुड़ खाते थे और कभी बीमार नहीं पड़ते थे।

एसिड बनाती है चीनी
शुगर शरीर में एसिड पैदा करती है, ये पेट में गैस का कारण बनती है। शुगर को पचाने में 500 कैलोरी खर्च होती है। यानी इसे डायजेस्ट करने में अधिक मेहनत की जरूरत होती है। शुगर खाने के बाद शारीरिक मेहनत न की जाए तो ये बाॅडी में हानिकारक रासायनिक प्रक्रिया शुरू कर देती है। जो पाचन क्रिया को स्लो करता है।

मधुमेह का कारक
आजकल लोगों में भ्रांति बैठ गयी है कि सफेद चीनी खाना सभ्य लोगों की निशानी है, तथा गुड़ आदि शर्करायुक्त खाद्य पदार्थ गरीबों के लिए हैं। यही कारण है कि अधिकांशतः उच्च या मध्यम वर्ग के लोगों में ही मधुमेह रोग पाया जाता है। श्वेत चीनी शरीर को कोई पोषक तत्त्व नहीं देती अपितु उसके पाचन के लिए शरीर को शक्ति खर्च करनी पड़ती है और बदले में शक्ति का भंडार शून्य होता है। उल्टे वह शरीर के तत्त्वों का पोषण करके महत्व के तत्वों का नाश करती है। सफेद चीनी इन्स्युलिन बनाने वाली ग्रंथि पर ऐसा प्रभाव डालती है कि उसमें से इन्सुलिन बनाने की शक्ति नष्ट हो जाती है। फलस्वरूप मधुप्रमेह जैसे रोग होते हैं।

क्यों ब्रिटेन के प्रोफेसर ज्होन युडकीन ने कहा चीनी को श्वेत विष
प्रो युडकीन ने सिद्ध किया है कि शारीरिक दृश्टि से चीनी की कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्य जितना दूध, फल, अनाज और शाक-भाजी उपयोग में लेता है उससे शरीर को जितनी चाहिए उतनी शक्कर मिल जाती है। बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि चीनी से त्वरित शक्ति मिलती है परन्तु यह बात बिल्कुल भ्रम जनित मान्यता है, वास्तविकता से बहुत दूर है।

हानिकारक रसायनों का होता है प्रयोग
सफेद चीनी को चमकदार बनाने की क्रिया में चूना, कार्बन-डाइआॅक्साइड, कैल्शियम, फास्फेटए फाॅस्फोरिक एसिड और पशुओं की हड्डियों का चूर्ण उपयोग में लिया जाता है। इसे इतने तापमान पर पकाया जाता है कि इसमें मौजूद पोषक तत्व निर्माण प्रक्रिया में ही समाप्त हो जाते हैं। सफेद चीनी लाल मिर्च से भी अधिक हानिकारक है।

चीनी की जगह गुड़ का करें सेवन
भारत में लंबे समय में मीठे के लिए गुड़ का प्रयोग होता आया है। गन्न से शुगर चीनी बनाने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है गुड़ बनाना। गुड़ को आज भी पारंपरिक विधि से ही बनाया जाता है, ये खाने में अधिक स्वादिष्ट होता है और पोशक तत्वों से भरपूर होता है। जो लोग गुड़ छोड़कर चीनी खाते हैं उनके स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आने की संभावना बनी रहती है।

चीनी में मात्र मिठास है और विटामिन की दृश्टि से तो यह मात्र कचरा ही है। चीनी खाने से रक्त में कोलेस्ट्राल बढ़ जाता है जिसके कारण रक्तवाहिनियों की दीवारें मोटी हो जाती हैं। इस कारण से रक्तचाप तथा हृदयरोग की शिकायत उठ खड़ी होती है। एक जापानी डाक्टर ने 20 देषों से खोज कर यह बताया था कि दक्षिणी अफ्रिका में हब्षी लोगों में मासाई और सुम्बरू जाति के लोगों में हृदयरोग का नामोनिशान भी नहीं, कारण कि वे लोग चीनी बिल्कुल नहीं खाते।

पचने में मुष्किल
चीनी के पचते समय एसिड उत्पन्न होता है, जिसके कारण पेट और छोटी अंतड़ी में एक प्रकार की जलन होती है। चीनी खाने वाले बालकों के दांत में एसिड और बैक्टीरिया उत्पन्न होकर दांतों को हानि पहुंचाते हैं। चमड़ी के रोग भी चीनी के कारण ही होते हैं। इसलिए बच्चों को पिपरमिंट-गोली, चाॅकलेट आदिशक्कर युक्त पदार्थों से दूर रखने की सलाह दी जाती है। अमेरिका में 98 प्रतिषत बच्चों को दांत का रोग है जिसमें शक्कर तथा इससे बने पदार्थ जिम्मेदार माने जाते हैं।

चीनी के संबंध में वैज्ञानिकों के मत

  1. हृदयरोग के लिए चर्बी जितनी ही जिम्मेदार चीनी है। काॅफी पीने वाले को काॅफी इतनी हानिकारक नहीं जितनी उसमें प्रयुक्त चीनी करती है। -प्रो ज्होन युडकीन, लंदन।
  2. चीनी एक प्रकार का नशा  है और षरीर पर गहरा प्रभाव डालता है। – प्रो लिडा क्लार्क।