स्वामी रामसुखदास महाराज से जुड़ी दो अविश्वसनीय घटनाएं

निखिल दुनिया ब्यूरो। स्वामी रामसुखदास महाराज भारतवर्ष के अत्यंत उच्च कोटि के विरले वीतरागी संन्यासी थे। वे गीताप्रेस के तीन कर्णधारों में से एक थे। उन्होंने गीता के मर्म को साक्षात् किया और अपने प्रवचनो से निरन्तर अमृत वर्षा करने लगे। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा संचालित समस्त साहित्य का स्वामी जी वर्षो तक संचालन करते रहे। स्वामी जी ने सदा परिव्राजक रूप में सदा गाँव-गाँव, शहरों में भ्रमण करते हुए गीताजी का ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाज के लिए एक आदर्श स्थापित।

उन्होंने प्रवचनों के माध्यम से बताया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए। स्वामी रामसुखदास महाराज ने सदा एक-एक क्षण का सदुपयोग करके लोगों को अपने में न लगाकर सदा भगवान्‌ में लगाकर, कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरो कों मान देकर द्रव्य-संग्रह, व्यक्ति पूजा से सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्र की कोई पूजा न करवाकर लोगों को भगवान की ओर प्रेरित किया। ऐसा आदर्श स्थापित करने वाले रामसुखदास महाराज ऋषिकेश के गंगा तट स्थित स्वर्गाश्रम में 3 जुलाई 2005 को ब्रह्म मुहूर्त 3 बजकर 40 मिनट पर भगवद्-धाम पधारे। स्वामी रामसुखदास जी महाराज के भगवद् धाम जाने के बाद की दो अविश्वसनीय घटनाओं का वर्णन किया जा रहा है।

पहली घटना
आमतौर पर जब किसी व्यक्ति का परलोक गमन होता है तो उसके दाह संस्कार के लिए एक चिता सजाई जाती है। पर स्वामी रामसुखदास महाराज के दाह संस्कार के समय ऐसा नहीं हुआ। उनके दाह संस्कार के समय एक नहीं बल्कि दो चिताएं सजाई गई।

पहली चिता पर स्वामी जी का पार्थिव शरीर रखा गया और दूसरी चिता पर स्वामी जी के वस्त्र, माला, पूजा के सामान आदि रखे गए। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि स्वामी जी नहीं चाहते थे, कि उनके भगवद् धाम जाने के बाद, उनको प्रेम करने वाले, उनके चिन्हों को सहेजकर, उनके नाम का कोई मंदिर बना लें। ऐसे थे परम वीतरागी संत स्वामी रामसुखदास जी महाराज।

दूसरी घटना
दूसरी घटना ऐसी है जो स्वामी रामसुखदास महाराज जैसे उच्च कोटि के संत की चिता के अवशेषों के साथ ही घट सकती है। जैसे ही दोनों चिताओं की अग्नि शांत हुई, मां गंगा की एक विषाल लहर आई और अपने साथ ही सभी अवशेषा को भी बहाकर ले गयी। इस प्रकार हमारी मां गंगा ने स्वयं अपने पुत्र को अपनी गोद में समेट लिया।