सेठ जी के सवाल का जवाब

स्वामी हरिओम जी की पुण्य स्मृति पर विशेष

काका हरिओम
निखिल दुनिया ब्यूरो।

दिखाई देने और होने में अक्सर बहुत फर्क होता है। संत जो अंदर से होते हैं, दिखाई नहीं देते और संसारी जो होते हैं, वह होते नहीं। इसीलिए महापुरूषों को समझने में अक्सर भूल हो जाती है। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि ‘मेरे जन्म और कर्म को जो सही रूप में तत्त्वतः जान जाता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाता है। और यह भी दृष्टि न होने के कारण अविवेकी लोग मनुष्य शरीर धारण करने वाले मुझे सामान्य जीव ही समझते हैं।’ लेकिन असल में दोनों में-तत्त्वज्ञानी अैर संसारी में बहुत अंतर होता है।
रामप्रेमियों से सुना है, एक बार स्वामी हरिॐ महाराज ट्रेन से सफर कर रहे थे। फर्स्ट क्लाश मेंं रिजर्वेशन था। उनका पहनना, उठना-बैठना राजसी लगता था। ऐसा लगता था मानों राज परिवार से हों। रेलवे स्टेशन पर उन्हें जो भी रामप्रेमी विदा करने आते थे, वो भी संभ्रान्त परिवारों से थे। समय पर ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया। कुछ समय की चुप्पी के बाद सहयात्री-जो उनके कंपार्टमेंट में बैठ कर सफर कर रहा था, स्वामी जी से पूछने लगा, ‘आप में और हम में क्या अंतर है?’ स्वामी जी ने तत्काल जवाब नहीं दिया। उन्होंने सेठ जी को बातों में उलझा लिया। एक तरह से वो सवाल को टाल गए। बुद्धिमान और संतों का यही तरीका होता है।
कुछ समय बाद स्वामी जी का वह मित्र बन गया। स्टेशन पर गाड़ी रूकी। स्वामी जी उसका हाथ पकड़े, स्टेशन पर थोड़ी दूर ले गए। समय हुआ, तो ट्रेन ने सीटी बजाई। जब तीसरी बार सीटी बजी, तो सेठ जी ट्रेन की ओर चलने के लिए व्याकुल हो गए। लेकिन स्वामी जी ने उनका हाथ नहीं छोड़ा। आखिर जब सेठ जी छटपटाने लगे, तो स्वामी जी तेजी से सेठ जी को लेकर आगे बढ़े। दोनों अपनी-अपनी सीटों पर बैठे थे। स्वामी जी ने सेठ जी से पूछा, क्या हुआ? क्यों परेशान थे? सेठ जी ने झुंझलाते हुए कहा, ट्रेन चली जाती, तो मेरा सारा सामान चला जाता-कीमती सामान भी। स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, मेरा सामान भी तो था। सेठ जी ने कहा, “आपकी बात अलग है।” स्वामी जी ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं, यही फर्क है आपमें और हममें। अपने सवाल का जवाब आपने स्वयं दे दिया।”
ऐसे प्रसंग क्या संदेश देते है? इनका तात्पर्य है, जब आपका कुछ है नहीं, तो उसके जाने की क्या चिंता। इसकी विवेचना गलत तरीके से नहीं होने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार की उपेक्षा की जाए, हां उसकी सार्थकता और व्यावहारिकता की समझ होनी चाहिए। ‘मेरा’ और ‘मैं’ के फर्क को समझने की आवश्यकता है। इनमें यदि घालमेल होगा, तो कर्म बंधन, दुःख का कारण बन जाएगा।
जो रामप्रेमी स्वामी हरिओम जी महाराज के व्यक्तित्व को जानते हैं, वो गवाह हैं इस बात के कि उनका जीवन महाराज जनक की तरह राजर्षियों का सा था, अर्थात् ऊपर से राजा का सा ऐश्वर्य और भीतर से सांसारिक भोगों से बिल्कुल असंग।
ध्यान रहे, ऐसे महापुरुषों को जानने-समझने के लिए दिव्य चक्षुओं की आवश्यकता हुआ करती है। लेकिन ऐसा भी उन्हीं की कृपा से होता है।
शत-शत नमन है स्वामी राम के प्रति समर्पित उस महान व्यक्तित्व के श्री चरणों में, जिसके रोम-रोम से ओउम का, प्रत्येक वाक्य के बाद ‘प्रणव’ का सहज गान हुआ करता था। इसीलिए तो वो अपने भक्तों के बीच ‘हरि ॐ’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए।