क्या आप मनुष्य और देवताओं की समय गणना को जानते हैं?

सबसे अत्यंत सूक्ष्म काल परमाणु को कहते हैं। दो परमाणुओं का एक अणु और तीन अणुओं का एक त्रसरेणु होता है। झरोखे से आयी सूर्य-किरणों में त्रसरेणु उड़ते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे तीन त्रसरेणुओं को पार करने में सूर्य जितना समय लेता है, उसे त्रुटि कहते हैं। सौ त्रुटियों का एक वेध, तीन वेधों का एक लव, तीन लवों का एक निमेष और तीन निमेषों का एक क्षण होता है। पांच क्षणों की एक काष्ठा, पंद्रह काष्ठाओं का एक लघु, पंद्रह लघुओं की एक नाड़िका, छः नाड़िकाओं का एक प्रहर और आठ प्रहरों का एक दिन-रात होता है। पंद्रह दिन-रातों का एक पक्ष, दो पक्षों का एक मास, छः मासों का एक अयन और दो अयनों का एक वर्ष होता है।

इस प्रकार मनुष्यों के एक वर्ष के समान देवताओं की एक दिन-रात है। अर्थात् मनुष्यों का छः महीनों का उत्तरायण देवताओं का एक दिन है। छः महीनों का दक्षिणायन देवताओं की रात है। इस तरह देवताओं के समय का परिमाण मनुष्यों के समय के परिमाण से तीन सौ साठ गुणा अधिक माना जाता है। इस हिसाब से मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात, मनुष्यों के तीस वर्ष देवताओं का एक महीना और मनुष्यों के तीन सौ साठ वर्ष देवताओं का एक दिव्य वर्ष है। ऐसे ही मनुष्य के सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि-ये चार युग बीतने पर देवताओं का एक दिव्ययुग होता है। अर्थात् मनुष्यों के सत्ययुग के सत्रह लाख अटठाईस हजार, त्रेता के बारह लाख छियानबे हजार, द्वापर के आठ लाख चैंसठ हजार और कलि के चार लाख बत्तीस हजार-ऐसे कुल तैंतालीस लाख बीस हजार वर्षों के बीत जाने पर देवताओं का एक दिव्य युग होता है। इसको महायुग और चतुर्युगी कहते हैं।

मनुष्यों और देवताओं के समय का परिमाण तो सूर्य से होता है, पर ब्रह्माजी के दिन-रात का परिमाण देवताओं के दिव्य युगों से होता है। अर्थात् देवताओं के एक हजार दिव्य युगों का (मनुष्यों के चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष) ब्रह्माजी का एक दिन होता है और उतने ही दिव्य युगों की एक रात होता है। ब्रह्माजी के इसी दिन को ‘कल्प’ या ‘सर्ग’ कहते हैं और रात को ‘प्रलय’ कहते हैं।