आज अधिक प्रासंगिक हैं स्वामी दयानन्द

प्रो. पी.के. आर्य। महान संस्कृतियां ऐसे ही महान नहीं हो जाती बल्कि मैं कहूं ऐसे ही महान नहीं बनी रहती हैं, नियति इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। हमें गर्व है कि हम जिस धरा पर जन्में, वहां हमसे पूर्व अनेक ऐसी महान विभूतियां विचरी हैं, जिनके ज्ञान और बोध से यह उपलब्धियों का जगत आज तक सुवासित है। आज तक ऊर्जास्वित है। लोगों की सूझबूझ जब चुकता होने लगती है तब परमात्मा अपनी दिव्य ज्योति से प्रदीप्त एक दीपक इस धरती पर उतार देते हैं। फिर उस दीपक से अनेकानेक दीपक प्रज्जवलित हो उठते हैं। अज्ञान का तमस शरण मांगता है और ज्ञान के प्रज्ञा पुंज जीवन के पथ को अधिक आलोकित अधिक आनंदित बनाते चले जाते हैं।

12 फरवरी 1824 को गुजरात प्रान्त के जनपद राजकोट अंतर्गत कठियावाड़ा क्षेत्र के ग्राम टंकारा में अमृत बाई और करशन जी लाल तिवारी के घर जन्में बच्चे का नाम रखा गया मूलशंकर। चेतना जब अपने स्वरूप को उपलब्ध होती है तो प्रायः ऐसे व्यक्तियों के जीवन के प्रारम्भ में ही उसके लक्षण भी प्रगट होने लगते हैं। मूलशंकर कोई 12 वर्ष के रहे होंगे तभी उनके जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिन्होंने उनके भविष्य की दशा और दिशा दोनों ही बदलकर रख दी।

अपनी बहन की अल्पायु में मृत्यु और पूजापाठ से जुड़ी भ्रांतियों ने मूलशंकर को सत्य के अनुसंधान हेतु प्रेरित किया। बालक के तेवर देख पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया। अग्नि को पकड़ सका है कोई, हवा को कौन बांध पाया है? दबाव का शिकंजा कसा तो मूलशंकर ने निर्जन रात्रि में घर का परित्याग कर दिया।

शुद्ध चैतन्य के अनुरागी बालक मूलशंकर ने बहुत भ्रमण किया। सभी तरह के गुरुओं और उपदेशकों को टटोला। उनके प्रश्नों और शंकाओं को कोई भी गिरा सका। योगाभ्यास के दौरान उनकी भेंट स्वामी पूर्णानंद से हुई। जिन्होंने उन्हें संन्यास में दीक्षित करके उन्हें नया नाम दियास्वामी दयानंद दयानंद अपने मार्ग पर तो थे लेकिन गंतव्य का कोई ओरछोर था। उन्होंने देशाटन का निर्णय किया।

एक वृद्ध संत के परामर्श पर मथुरा निवासी चक्षुहीन गुरु विरजानंद से मिलने के लिए दयानंद निकल पड़े। गुरु द्वार पर दस्तक दी तो भीतर से प्रतिप्रश्न आया-‘कौन?’ ‘यही तो जानने आया हूं!’ दयानंद ने उत्तर दिया।तुम सही स्थान पर आये हो और तुम अन्दर सकते हो।विरजानंद ने दयानंद को स्वीकार कर लिया था।

तीन वर्ष तक गुरु सानिध्य में रहने के बाद दयानंद ने गुरु इच्छा के अनुसार देशाटन प्रारम्भ किया। उन्होंने देश को आडम्बर, पाखण्ड और कुरीतियों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ देख एक नयी आध्यात्मिक क्रांति का बिगुल फूंक दिया। हरिद्वार में कुंभ मेले में स्वामी दयानंद नेपाखंड खंडनी पताकाफहराकर धर्म के नाम पर व्याप्त अनेक कुरीतियों का प्रतिकार किया। उन्होंने लोगों को बहुत अधिक तेजी से प्रभावित किया।

संस्कृत और हिन्दी में उनके धारा प्रवाह प्रवचनों से देश गुंजायमान होने लगा। अनेक कुप्रथाओं और गलत नीतियों पर उनके प्रहार से एक तरफ समर्थकों की संख्या बढ़ती चली गयी तो दूसरी ओर उनके विरोधी भी लामबंद होने शुरू हो गए। 10 अप्रैल 1875 को स्वामी दयानंद सरस्वती ने मुंबई मेंआर्य समाजकी स्थापना की। इसी वर्ष उन्होंने अपने ग्रन्थसत्यार्थ प्रकाशकी भी रचना की। उन्होंने आर्य समाज के लिए प्रथम दस नियमों का प्रतिपादन किया। अत्यंत अक्रामक रूप में उन्होंने सामाजिक संधान का कार्य प्रशस्त किया। उन्होंने दबी कुचली स्त्रियों के लिए सम्मान और प्रतिष्ठा के नये द्वार खोले। विधवाओं की स्थितियां तब कोई बहुत अच्छी नहीं थी उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह प्रारम्भ कराये।

दलितों और वंचितों के लिए समाज में कोई स्थान था ही नहीं अपमान का घूंट पीकर जी रहे इस तबके के सर पर उन्होंने सत्कार की पगड़ी बंधवाई। उन्होंने वेद के उस वचन की तरफ सभी को मोड़ने का कार्य किया जिसमें व्यक्ति की मान्यता उसके जन्म के नहीं अपितु कर्म के आधार पर निश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्राह्मण के घर जन्मा व्यक्ति यदि नीच कर्म में लिप्त है तो वह शूद्र है और शूद्र के घर में जन्मा व्यक्ति यदि श्रेष्ठ और अनुकरणीय आचरण वाला है तो वही वस्तुतः पंडित है। उनकी मान्यता थी कि जात पात और भेद भाव से भरे समाज में आप कभी भी वास्तविक प्रगति नहीं कर सकते हैं।

स्वामी दयानंद स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे। कई ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि स्वतंत्र भारत की कल्पना करने वाले वे प्राथमिक विचारकों में से अग्रणी थे। उन्होंने स्वराज की पुरजोर वकालत की। उनकी मान्यता थी कि देश में अपना शासन अपनी भाषा और अपनी संस्कृति की स्थापना के बिना राष्ट्र का उद्धार नहीं हो सकता है। स्वामी दयानंद को संन्यासी योद्धा के रूप में भी ख्याति मिली। उन्होंने परिणाम की चिंता किये बिना सामाजिक सुधार के अपने प्रयासों को गति प्रदान की।

तत्कालीन समाज में कुछ लोगों को अछूत मानकर उनसे भेदभाव किया जाता था। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया। जिस सामाजिक समरसता और सबका साथ सबके विकास की बात आज के राजनेता करते हैं स्वामी जी उस विचार के बीज को रौंपने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने उस समय व्याप्त सती प्रथा और बाल विवाह का भी विरोध किया।

उन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में विवाह सम्बन्ध और स्त्री पुरुष की आयु के सम्बन्ध में स्पष्ट मंतव्य व्यक्त किया है। स्वामी दयानंद ने सभी के शिक्षित होने का स्वप्न देखा था। वे भ्रूण हत्या के प्रबल विरोधी और स्त्री सत्ताके परम सम्मान के समर्थक थे। उनका मानना था कि यदि स्त्री शिक्षित होती है, तो वह कईं कुलों को शिक्षित करने का कार्य करती है। उन्होंने निहित स्वार्थ के लिए धर्म की आड़ में फल फूल रहे आडम्बरों का भी प्रतिवाद किया। उनका ईश्वर के विषय में स्पष्ट मत था और वेदों को वे प्रार्थना का सर्वोच्च आयाम मानते थे।

राजा के कार्यों में पारदर्शिता और शासन के संचालन में सामंजस्य के गुर उनके प्रवचनों के सार थे। वे पूर्व में की गई गलतियों को पुनः कभी करने की बात कहते थे। देश के उद्धार के लिए हिंदी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के उत्थान को उन्होंने बहुत बल दिया। उनके अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि और ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में उनके मौलिक विचार सुस्पष्ट रूप में प्राप्य हैं। वे योगी थे तथा प्राणायाम पर उनका विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे।

राष्ट्र जागरण की दिशा में उन्होंने सामाजिक क्रांति तथा आध्यात्मिक पुनरुत्थान के मार्ग को अपनाया। उनकी शिक्षा सम्बन्धी धारणाओं में प्रदर्शित दूरदर्शिता, देशभक्ति तथा व्यवहारिकता पूर्णतया प्रासंगिक तथा युगानुकूल है। महर्षि दयानन्द समाज सुधारक तथा धार्मिक पुनर्जागरण के के प्रवर्तक तो थे ही, वे प्रचण्ड राष्ट्रवादी तथा राजनैतिक आदर्शवादी भी थे। विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने के कारण आपस की फूट, मतभेद, ब्र२चर्य का सेवन करना, विध्ाान पढ़नापढ़ाना बाल्यावस्था में स्वयंवर विवाह, विषयासक्ति, मिथ्या भाषावादि, कुलक्षण, वेदविद्या का प्रचार आदि कुकर्म हैं, जब आपस में भाईभाई लड़ते हैं और तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। उन्होंने राज्याध्यक्ष तथा शासन की विभिन्न परिषदों एवं समितियों के लिए आवश्यक योग्यताओं को भी गिनाया है।

उन्होंने न्याय की व्यवस्था ऋषि प्रणीत ग्रन्थों के आधार पर किए जाने का पक्ष लिया। उनके विचार आज और भी अधिक प्रासंगिक हैं। सत्य की निर्धूम शिखा जब भी चमकी है तब तब समाज के ही कुछ लोगों ने उसे सदा सर्वदा के लिए बुझाने के लिए षडयंत्र रचे हैं। स्वामी जी भी इसका अपवाद थे। जोधपुर के विलासी राजा जसवंत के यहां आतिथ्य करते हुए उन्होंने एक वेश्या नन्हीं के प्रति उनके अनुराग पर राजा को फटकार लगायी। राजा ने तो क्षमा मांग ली लेकिन वेश्या ने इस अपमान का बदला स्वामी जी की हत्या का षडयंत्र रचकर लिया। उसने उनके रसोइये जगन्नाथ को पैसा देकर स्वामी जी के दूध में कांच का चूरा और विष मिलवा दिया। जिससे स्वामी जी फिर उबर सके। अपने हत्यारे को क्षमा दान देकर 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली की संध्या बेला में ज्ञान की वह परम ज्योति शांत हो गई हजारोंलाखों अन्य दीयों को प्रदीप्त करके स्वामी जी की सभी शिक्षाओं पर हम यदि आज भी अमल कर लें तो हमारा और हमारे राष्ट्र का उत्थान होने से कोई भी नहीं रोक सकता। उनकी देशना अमर रहेगी सदा सर्वदा!