आत्मा क्या है?

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। 

यह शरीर पांच तत्वों से बना है। अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश। एक दिन यह शरीर इन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। आत्मा एक शरीर धारण कर जन्म और मृत्यु के बीच नए जीवन का उपभोग करती हुई पुनः शरीर के जीर्ण होने पर शरीर छोड़कर चली जाती है। आत्मा का यह जीवन चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कि वह मुक्त नहीं हो जाती या उसे मोक्ष नहीं मिल जाता।

पंच तत्वों नामक मनुष्य यंत्र में वास करती है ‘आत्मा’ यानी परमात्मा का अंश। जब परमात्मा का अंश आत्मा बनकर देह में वास करता है तब मनुष्य जीवित होता है। मनुष्य जैसे रथ का उपयोग करता है, वैसे ही आत्मा शरीर नाम के इस यंत्र का उपयोग करती है। शरीर के माध्यम से शरीर के सुख-दुख का उपभोग करती है। मगर आत्मा शरीर नहीं है। शरीर का नाश किया जा सकता है। किंतु आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता है। आत्मा शरीर में रहते हुए भी अमर है। शरीर की हत्या की जा सकती है, मगर आत्मा की हत्या नहीं की जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति, पशु, पक्षी, जीव, जंतु आदि सभी आत्मा हैं। खुद को यह समझना कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूं। यह आत्मज्ञान के मार्ग पर रखा गया पहला कदम है।

आत्मा तो सर्वव्यापी, सनातन है। मनुष्य जैसे पुराना वस्त्र त्याग कर नया वस्त्र धारण करता है ठीक वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर बार-बार नया शरीर धारण करती है। मनुष्य इस शरीर के माध्यम से ही जगत का अनुभव करता है। हम लोग स्वयं को नहीं जानते तो फिर आत्मा को कैसे जानेंगे। स्वयं को आत्मा के रूप में जानना असंभव ही है। इस संसार में अंधे भी जीते हैं, गूंगे भी जीते हैं, जिनके पास हाथ-पैर नहीं होते वो भी जीते हैं। जिसकी चेतना चली जाती है, जिसे मूच्र्छा आ जाती है वो भी जीवित रहता है। इससे स्पष्ट है कि मनुष्य का चेतन तत्व भी आत्मा नहीं है। इसी प्रकार जो मनुष्य अपने भीतर खोज करता है, मैं इन्द्रियां नहीं, शरीर नहीं, भावनाएं नहीं, विचार नहीं, जो यह समझता जाता है। अंत में स्वयं को आत्मा के रूप में जान ही लेता है।

मोह और माया के कारण आत्मा को विस्मरण हो जाता है कि वो परमात्मा का अंश है। अधिकतर आत्माएं अपनी देह को ही सब कुछ मानती हैं। स्वयं देह से भिन्न यह जान ही नहीं पाती कि शरीर को जो सुख-दुख, स्वाद, गंध आदि का जो अनुभव होता है, उसे अपना अनुभव होता है और बदलाव का प्रयास ही नहीं करती। जो आत्माएं बदलाव का प्रयत्न ही नहीं करती, निरंतर अधर्म ही करती हैं। उन्हें जागृत करने के लिए भगवान समय-समय पर दंड देते हैं।