मृत्यु के बाद व्यक्ति कहां जाता है?

परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद महाराज। भारतीय जन मानस का यह सहज विश्वास है कि मृत्यु के उपरान्त भी व्यक्ति की यात्रा समाप्त नहीं होती है। इसी धारणा से जुड़ी है कथाएं स्वर्ग की, नरक की, यमराज की, देवदूत के आगमन की और किसी उड़न खटोले में बैठकर मृत्यु के उपरान्त किसी दिव्य धाम चले जाने की।

सीधी सी बात है कि व्यक्ति न तो यह स्वीकार कर पाता है कि मृत्यु के उपरान्त उसका जीवन समाप्त हो जाएगा और न यह स्वीकार कर पाता है कि मृत्यु के पश्चात् उसका जीवन किसी अंधेरे में खोज जाएगा, जबकि सच्चाई यह है कि हमें मृत्यु के पश्चात् के जीवन का कुछ भी तो सही-सही नहीं पता और इस भय की पूर्ति करते हैं हम विविध कल्पनायें करके।
विविध कल्पनाओं, स्वर्ग-नरक के तानों-बानों के बीच बुनी एक रहस्यात्म्क कथा के पश्चात् जो तथ्य परक विषय है, वह यह है कि वास्तव में व्यक्ति की केवल एक देह ही नहीं होती, उसकी एक के बाद एक करके क्रमशः सात देह होती हैं।

जिसको हम मृत्यु कहते हैं, वह व्यक्ति के स्थूल शरीर का नाश है। इसके पश्चात् उसका इच्छा शरीर, सूक्ष्म शरीर, मनस शरीर जैसे कई भेद हैं और इन्हीं शरीरों की अंतिम स्थिति है-व्यक्ति की अपनी आत्मा। इन परतों के नीचे छिपे उस आत्म प्रकाश तक की यात्रा, व्यक्ति इस जीवन में भी कर सकता है और मृत्यु के उपरान्त भी। वास्तव में मनुष्य स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनों लेकर जीवन भर एक साथ चलता रहता है, जिसका एक सामान्य सा उदाहरण है, व्यक्ति के सपनों की दुनिया। जिसमें उसका सूक्ष्म शरीर उसकी देह से अलग होकर कालखण्ड में आगे और पीछे विचरण कर लेता है। यही स्थिति जाग्रत अवस्था में भी संभव है।

व्यक्ति जीते जी, अपनी आंखों से, अपने स्थूल शरीर से अलग होकर कालखण्ड में आगे व पीछे गमन कर स्थितियों को देख सकता है, सुन सकता है, समझ सकता है। योगीजन सदैव ऐसी स्थितियों में ही अवस्थित रहते हैं, इसी से किसी का
भूत-भविष्य और वर्तमान उनके लिए अगोचर नहीं रक जाता। इस लेख में हमारा विषय वस्तु सूूक्ष्म शरीर का विवेचन न होकर यह है कि मृत्यु के उपरान्त जीवन होता है? और यदि वह जीवन होता है तो कैसा होता है? उसमें क्या विशेषता होती है?

मृत्यु के उपरान्त का जो संसार है, उसमें कैसा आवागमन है? किस प्रकार का संबंध है? किस प्रकार की शारीरिक स्थिति है? वहां रहना सुखद है या दुखद? यही वे प्रश्न हैं जो सामान्य मानव के अन्दर चलते रहते हैं, जिनके सही उत्तर न मिल पाने के कारण व्यक्ति जीवन भर मृत्यु शब्द से भयभीत रहता है और अपनी आयु बढ़ाने के लिए सोचता रहता है। परन्तु मृत्यु भयानक और डरावना शब्द न होकर एक प्रकार से पुराने शरीर को नवीन शरीर में रूपांतरित कर देने की क्रिया है। इसीलिए शरीर को वस्त्र कहा गया है और मूल स्थिति आत्मा की मानी गयी है।

मृत्यु को हमारे यहां ‘जीवन का श्रृंगार’ और जीवन का आनंद कहा गया है, तभी तो कबीर दास को जब इब्राहित लोधी ने मरवा देने की धमकी दी तो कह उठे- जा मरने से दुनियां डरे, मरे मन आनन्द। कब मरिहों कब देखिहों, पूरन परमानन्द।।

पाश्चात्य देशों में भी इसी तरह की स्थितियों को लेकर खोज की यी और वहां पर इस विषय में मिलने वाले साहित्य की एक लम्बी सूची है, जिनमें ‘फैन्टाज्म्स आॅफ द लिविंग’ ‘द सोल आफ थिंग्स’ इनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथों के नाम हैं। इस विषय में क्या मृत्यु के उपरान्त कोई जीवन है, इस बात का आधार बन सकता है तो केवल ऐसा कोई व्यक्ति जो कभी किसी दुर्घटनावश घायलावस्था में मृतप्राय हो गया हो अथवा जो लोग किसी गम्भीर बीमारी में ग्रस्त होकर डाक्टरी भाषा में मरने की स्थिति में पहुंच गए हों।

ऐसे भी कई उदाहरण समाज में मिलते ही हैं कि जब कोई व्यक्ति श्मशान ले जाया जा रहा हो और वह रास्ते में अथवा चिता पर उठ बैठा हो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि मृत्यु की स्थितियों में गये व्यक्ति के अनुभव को जान सकें। इस विषय में भेंट वार्ताएं करने के बाद, उनके अनुसार वर्णन कें ढंगों में तो अन्तर है। लेकिन मूल रूप से सभी एक ही बात का वर्णन करते आये हैं।

ऐसे इन सभी व्यक्तियों ने सामान्य रूप से एक जैसी ही स्थितियां बताई हैं कि वे एकाएक हल्के होकर हवा में तैर गये, उन्होंने अपने शरीर को अलग हटकर देखा। उन्होंने अपने संबंधियों से बातचीत करनी चाही, किंतु उनकी आवाज किसी ने नहीं सुनी, उन्होंने सभी को स्पर्श करना चाहा किंतु उनके स्पर्श को कोई समझ नहीं सका। एक प्रकार से वे वायु सदृश्य हो उठे जिससे कि वे किसी को दिखाई पड़ने में अथवा सामान्य व्यक्ति की तरह अनुभव होने में असंभव से हो गए।